Thursday, 20 July 2023

भक्त वहीं है जो भगवान से भगवान की भक्ति के अलावा कुछ न मांगे ।

भक्त वहीं है जो भगवान से भगवान की भक्ति के अलावा कुछ न मांगे । 
गुरू से गुरू कि भक्ति तथा प्रेम के अलावा कभी कुछ नहीं मांगना चाहिए, नहीं तो ठगा जाएंगे । 
हमें अर्जुन कि तरह बुद्धिमान होना चाहिए। अर्जुन ने विकट परिस्थितियों में भी भगवान से भगवान को हीं मांगा था । उसने न धन मांगा , न सेना मांगा, न आयु मांगा , न शक्ति मांगा । अर्जुन ने तो भगवान से भगवान को हीं मांगा था । 
जहां हरि गुरू हैं वहां विजय है , वहीं सुख है तथा परमानंद है । 
संसारिक सुख का अंतत्वोगत्वा प्रतिफल दुख हीं है । संसार में जिस वस्तू में , बिषय में या व्यक्ति से जितना सुख प्राप्त हुआ जान परता है उसमें अंतत्वोगत्वा उससे भी अधिक दुख है जो हरेक को मिलना तय है एक समय के बाद । संसारिक सुख घटते घटते उसी मात्रा के दुख में परिवर्तित हो जाता है अवस्य एक दिन । और हमें तो सास्वत् सुख तथा आनंद ही चाहिए , एक भी जीव संसार में ऐसा नहीं जो कभी भी दुख चाहता हो ।

हरिगुरू स्वयं आनंद है ये दोनों आनंद का ऐसा भंडार जिसे जितना पाओ उतना ही बढ़ता जाता है । ये धन कभी न समाप्त होने वाला है और न घटने वाला है । इसे तो जितना खर्च करो उसका सौ गुणा बढ़ने वाला धन है । 

भगवान और गुरू आनंद स्वरूप है , प्रकाश स्वरूप है , उनसे उनको मांग लेने का मतलव ही है आगे के तमाम जीवन तथा जन्मों का सभी कष्ट दुखों का सदा के लिए समन हो जाना । जब प्रकाश मिल जाएगा तो तमाम अंधियारा अपने आप भाग ही जाएगा , स्वाभाविक है । 

अत: हम यह क्यों कहे हरि गुरू से कि हमारा कष्ट दुर कर दो, दुख दूर कर दो ? हमें तो सिर्फ यह कहना है कि हे प्रभु हमें तो तुम ही चाहिए, तेरे सिवा और कुछ नहीं चाहिए। 

अत: हमें मांगने में अर्जुन के तरह बुद्धिमान होने कि आवश्यकता है । हमारे गुरूदेव ने हमारी आंखें खोली है । इसलिए इस मामले में हमें सदा होशियार रहना है । 
श्री राधे ।

कट्टरपंथियों का त्याग ।

सभी राष्ट्र,सभी समाज के जिम्मेदार संभ्रांत तथा आस्तिक लोगों को चाहिए कि कट्टरपंथियों का वो पुर्ण रूप से समाजिक बहिष्कार करें, पुर्णत: त्याग करें चाहे वो किसी भी धर्म,मजहब,देश या जाति या संप्रदाय का हो । 
 कट्टरपंथी केवल नास्तिक बिचार धारा का होता है, क्योंकि वो ईश्वर के संविधान का खिलाफत करता है , ईश्वर के कानून को अपने हाथ में लेता है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार एक क्रिमिनल देश के संविधान को न मान कर कानून को अपने हाथ में लेता है। 
जो व्यक्ति , समाज ईश्वर का आदर करता है , उनमें पुर्ण रूप से भरोसा ,‌श्रद्धा और विश्वास रखता है वो किसी भी व्यक्ति के उदंडता का फैसला ईश्वर पर छोड़ देता है । वो उनका कानून अपने हाथ में कभी नहीं लेता है , वो किसी के भी धर्म और ईष्ट तथा संतों के प्रति गलत भाषा का प्रयोग कभी नहीं करता । 
किसी भी धर्म के संतों महापुरुषों, अवतारों के बहुत से व्यवहार अटपटे होते हैं । कोई भी जीव उनके व्यवहारों को ठीक से कभी नहीं समझ सकता , जब तक वो उनको प्राप्त न कर लिया हो । 

अगर कोई भी मनुष्य ये दावा करता है कि वो किसी भी धर्म , मजहब , जाति में जन्म या अवतार लिए संतों , महापुरूषों , ईंष्ट के लीला को , ( उनके अवतार काल में किए संसारिक व्यवहार ) को ठीक ठीक समझ गया है तो भला वो व्यक्ति स्वयं महापुरूष क्यों नहीं बन गया ?

अगर वो बन गया है तो फिर उसके दिल में किसी भी मानव तथा सभी जीव जंतुओं तथा पेड़ पौधे तक के लिए आदर , प्रेम , करूणा तथा दया का भाव जागृत हो जाना चाहिए स्वत: । 
फिर तो उसमें किसी भी धर्म , समाज , जाति , देश के प्रति किसी भी प्रकार का नफरत , धृणा , द्वेष , ईर्ष्या का भाव या बिचार कभी प्रकट नहीं होना चाहिए स्वाभाविक तौर पर । 

किसी के भी प्रति नफरत , द्वेष , घृणा , ईष्या , दुश्मनी का भाव और कट्टरता यह साबित करता है कि वो व्यक्ति , पुर्णत: नास्तिक है वो अपने अपने धर्म के ईष्ट तथा संतों एवं महापुरुषों के प्रति वफादार तथा जिम्मेदार विल्कूल भी नहीं हैं । 

इसलिए सभी को अपने ह्रदय को टटोलना चाहिए कि क्या ईश्वर इजाजत देते हैं किसी को कि वो किसी के उदंडता का खुद ज़बाब दे और उनके आदेशों तथा बनाऐ गए नियम की अवहेलना करें ? 

भगवान राम ने अयोध्यावासियों को कभी यह अधिकार नहीं दिये कि वो उस धोवी को दंडित करे जिन्होंने माता सीता, उनकी धर्म पत्नी पर लांक्षण लगाया, इतना बड़ा अपराध किया ? 

भगवान कृष्ण ने भरी सभा में शिषु्पाल से सौ गाली सुनने तक उसे माफ किया और उसके बाद वो स्वयं उसे सजा दिये , जबकि उनके अनेकों अनन्य भक्त भी उस सभा में उपस्थित थे , पर किसी ने भगवान का कानून अपने हाथ में नहीं लिया । क्योंकि वो सभी आस्तिक थे और सर्वसत्ता पर भरोसा करते थे । 

भगवान बुद्ध को अंगुलिमाल ने बहुत भला बुरा बोला , वो मुस्कुराते रहे , उनके कुछ अनुयाई भी उनके साथ थे , किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी , क्योंकि उनको भगवान बुद्ध पर पुर्ण भरोसा था कि वो न्याय करेंगे , समर्थ है । और भगवान बुद्ध ने प्रेम से उस अंगुलीमाल डाकू को समझाया , अंगुलीमाल ने उनको पेंड़ में बांध कर अपने परिजनो से पुछने गया , कि बुद्ध जो कह रहे हैं वो क्या सही है । फिर वो आकर बुद्ध के चरणों में गिर गया । 

तुकाराम को नदी से स्नान करके बाहर लौटते समय एक जीव ने बार बार पान का पीक उनके अंगवस्त्र पर फेंका । पर वो हर बार स्नान करते रहे , कोई प्रतिक्रिया नहीं दी , अंत में वो दुष्ट उनके इस सहनशीलता से प्रभावित होकर उनके चरणों पर गिर कर खुद को सरेंडर कर दिया ।

पैगंबर मुहम्मद साहब पर एक यवन महिला ने कुड़ा फेंक दिया करती थी छत से जब रास्ते से गुजरते थे तब , पर वो मुस्कुरा कर उसे माफ कर देते थे , एक दिन वो बिमार हो गई तो पैगंबर मुहम्मद साहब उसके घर पर गए उसका हाल पुछने और बड़े अदब और प्रेम से पेश आए , उन्होंने भी लोगों में आपसी प्रेम का शिक्षा दिय थे । 

संत रूपगोस्वामी जी ने अपने सबसे प्यारे शिष्य जीव गोस्वामी जी का त्याग कर दिये थे जबकि जीव गोस्वामीजी जी का अपराध इतना था कि एक विद्वान ने जब उनके गुरू रूपगोस्वामी जी के पद् पर टिका टिप्पणी किए थे तो जीव गोस्वामी जी ने उनका विनम्रता से हीं विरोध किया था और उनसे शास्त्र के उपर थोड़ा सा बहस किया तथा उनको अपने गुरू से शास्त्रार्थ करने के लिए आवाहन किए थे ।‌

ईशा मसीह को सूली पर चढ़ा दिया गया पर वो फिर भी प्रेम का संदेश हीं दिय , शिक्षा दिये लोगों को । 

इस प्रकार हरेक धर्म में , जाति में , समाज में ईश्वर के अवतारों ने , संतों ने , महापुरुषों ने प्रेम कि हीं शिक्षा दिय है । कोई नफरत , ईर्ष्या , द्वेष , घृणा का शिक्षा किसी भी धर्म में नहीं है । 

जो जीव इस बात को नहीं समझते या मानते हैं , अज्ञानी है , शास्त्रों का सही जानकारी नहीं है, अपने ईष्ट को नहीं जानते हैं , भरोसा नहीं है जिनको , वही‌ लोग ईश्वर का कानून अपने हाथ में लेते हैं वो पुर्णत: नास्तिक है , अत: ऐसे भटके हुए लोगों का परित्याग आवश्यक है विश्व शांति के लिए, मानवता के कल्याण के लिए ।:- संजीव कुमार ।

Courtesy ( शिष्टाचार) इस शब्द के पीछे बड़ा धोखा है । बनाबट है , खोखलापन है । शिष्टाचार एक बनावटी व्यवहार को , बनावटी तारीफों के शब्दों को सुचित करता है । बड़े बड़े लोग , महान लोगों के लिए शिष्टाचार के नाते दो शब्द , दो बनावटी बातें उनके तारिफ में बोल देते हैं । लेकिन इसमें प्रेम भाव का सर्वथा आभाव होता है ।

Courtesy ( शिष्टाचार) इस शब्द के पीछे बड़ा धोखा है । बनाबट है , खोखलापन है । शिष्टाचार एक बनावटी व्यवहार को , बनावटी तारीफों के शब्दों को सुचित करता है । बड़े बड़े लोग , महान लोगों के लिए शिष्टाचार के नाते दो शब्द , दो बनावटी बातें उनके तारिफ में बोल देते हैं । लेकिन इसमें प्रेम भाव का सर्वथा आभाव होता है ।

 हालांकि बड़े बड़े नामचीन लोग एक्टिंग तो बढ़िया कर लेते हैं । लेकिन एक वास्तविक प्रेमी को पता चल हीं जाता है कि उनके बातों में प्रेम भाव का आभाव है । समर्पण का आभाव है । इसलिए इसे courtesy sentance भर ही समझना चाहिए। 

बड़े बड़े देश के राष्ट्रपति किसी दुसरे देश के शासनाअध्यक्ष के लिए शिष्टाचार बस सम्मान में दो वाक्य बोल देते हैं पर ह्रदय में वो भाव नहीं होता । 
इसलिए कुछ समय बाद वही व्यक्ति विरोध में बातें करने लगतें है । उनका असली भावना , चेहरा प्रकट हो जाता है । 
संसार के लोग धोखे में आ जाते हैं । 
झूठी तारीफ को सच मान कर खुश हो जाते हैं । 
लेकिन यही तो सबसे बड़ा धोखा है । 
आजकल भगवदिए एरिया में भी ऐसा है । 
अत: मेरा मानना है कि हमें ऐसे लोगों के द्वारा शिष्टाचार के नाते कहे गए बातों को आधार नहीं मानना चाहिए। सीरियसली नहीं लेना चाहिए। 

भगवद् एरिया में हमें केवल गुरू के समर्पित जीवों के भावों को हीं अपना आधार बनाना चाहिए । 
एक समर्पित, श्रद्धालु , शरणागत जीव के जो भाव है अपने गुरू के प्रति उसमें सच्चाई होती है । उसमें प्रेम की विशूद्ध भावना भरी होती है अपने गुरू और ईष्ट के प्रति । वो जो कुछ कहतें है अपने गुरू के सम्मान में वो उसके ह्रदय तल कि आवाज होती है , प्रेम का अनुभव तथा भाव समाहित होता है । 
हमारे लिए यही महत्वपूर्ण आधार है । 
समर्पित साधक केवल मुख से या वचन से अपने ईष्ट और गुरू के गुणों को नहीं गाता , वल्कि उसका तन मन तथा धन भी अपने गुरू और ईष्ट के प्रति समर्पित होता हैं ।

मैंने तो देखा है कि कुछ नामचीन तथा अरबपति लोग जो जनता के सामने किसी महान व्यक्ति के लिए तारीफ का पुल बांध कर स्टेज से जब निचे उतरे और उनको कुछ दान करने के लिए आग्रह किया गया तो वो बोले अभी नहीं बाद में आइएगा । और फिर वो कभी संपर्क में नही आए । और ऐसा लगभग 99% नामचीन लोग हैं । मुख से तारिफ करने में क्या जाता है ! ऐसे लोगों का भाव हीं होता है :- 
"वचनम् किं दरिद्रम "

वो शिष्टाचार निभा रहा है महान लोगों के अनुयायी के तुष्टि के लिए बस इससे अधिक कुछ भी नहीं उसके पास ।
अत: ऐसे लोगों के बातों का विश्वास हमें कभी नहीं करना चाहिए। हमें भी वोल देना चाहिए स्वागत है आपका , आपने बड़ी अच्छी बातें की, शुक्रिया, थैंक्यू । 
बस इतना ही । 

हमारे श्री महाराज जी ने सिखाया है हमें इन लोगों के चक्कर में न पड़ो कभी , इनके बातों पर भरोसा न करो । 
वो वोल रहा है तो तुम भी वोल दो एक्टिंग में थैंक्यू । लेकिन इनको सीरियसली न लो । 
सूई के छेद से कड़ोरो ऊंट का काफिला निकल सकता है पर ऐसे लोग ह्रदय से भगवद् प्रेमी हो जाए , असंभव ।

हां भगवान का , गुरू का वास्तविक भक्त , सच्चा साधु , सच्चा संत , समर्पित जीव आदि जिसमें दीनता , नम्रता , सहिष्णुता, अहंकार शून्यता भरपुर है वो कुछ भाव प्रकट करतें है हमारे गुरूदेव के सम्मान में तो वो हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है । इनके शब्द ह्रदय के गहराईयों से निकलती है । इसमें भगवद् प्रेम का रस घुला होता है जो हमारे ह्रदय और आत्मा को भी तृप्त करती है । इसलिए हमें केवल ऐसे जीवों के प्रेम भाव को ही स्वीकार करना चाहिए। इनका भाव हमारे भगवद् भावना के ज्योति को और अधिक प्रज्वलित कर देती है , बढ़ा देती है । 

श्री राधे ।

अच्छे बुरे में फर्क को कैसे जानना चाहिए ताकि वो बुरे व्यक्ति, बुरे बिषय तथा बुरे वस्तू से बच सके , मन में उठ रहे निगेटिविटी से कैसे बचें ?

प्रश्न :- शिष्य को संसार में अच्छे बुरे में फर्क को कैसे जानना चाहिए ताकि वो बुरे व्यक्ति, बुरे बिषय तथा बुरे वस्तू से बच सके , मन में उठ रहे निगेटिविटी से कैसे बचें ? 

पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी द्वारा उत्तर :- 
एक शिष्य को , साधक को संसार में अच्छे और बुरे बिषय, बस्तू तथा व्यक्ति में अंतर अपने गुरू के सिद्धांतों के कसौटी पर कस कर करना चाहिए। 
जो भी बिषय , व्यक्ति या वस्तू गुरू के सिद्धांतों के प्रतिकूल है उन सभी से दुर रहना श्रेयकर है । जो व्यक्ति हमारे गुरू के सिद्धांतों के विरोधी बातों को मानता हो तथा करता हो , उनसे हमें दुर रहना है । 
हमें हर बिषय बस्तुओं तथा व्यक्ति की पहचान अपने बुद्धि को गुरू के बुद्धि से जोड़कर करना चाहिए। 
गुरू के बुद्धि से अपनी बुद्धि को जोड़ने का मतलव है उनके सिद्धांतों के कसौटी पर किसी बिषय, वस्तु तथा व्यक्ति को कस कर उसे पहचानना तथा विरोधी तत्वों से स्वयं को दुर रखना । गुरू का दिया तत्वज्ञान, सिद्धांत ज्ञान हमारी आंखें तथा बुद्धि है, पैमाना है ।

 बस हमें यह ध्यान रखना है कि किसी कि बुराई नहीं करनी है, उसमें रस नहीं लेना है , इंटरेस्ट नहीं रखना है , लेकिन अच्छे और बुरे में अंतर , अनुकुल और प्रतिकुल व्यक्ति में अंतर तो हमें समझना ही होगा । नहीं तो हम कुसंग और कुसंगी से बचेंगे कैसे ? फर्क पहचानेंगे तभी तो बचेंगे कुसंग और कुसंगी से । 
यहां तक कि हमें स्वयं के मन के भावों को , मन में उठ रहे बिचारो को , संकल्पों को अपने गुरू के सिद्धांतों के कसौटी पर हर बार , बार-बार परखते रहना चाहिए, जो भाव, बिचार तथा संकल्प अनुकुल नहीं है उसे तुरंत त्याग देना चाहिए, राधे राधे करना शुरू कर देना चाहिए । मन में गलत भाव आवे , गलत बिचार उत्पन्न हो , निगेटिव ख्याल आवे तो हरि गुरू को याद करने लगना चाहिए , तत्वज्ञान से गलत बिचार तथा निगेटिव भाव दुर हो जाते हैं । 
:- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी ( युवा शिविर ब्रजगोपिका धाम )।

किसी के द्वारा ईर्ष्या द्वेष जलन आदि करने पर क्या करें ?

प्रश्न :- मां कुछ लोग हमारे संसारिक उपलब्धि यहां तक कि अध्यात्मिक उपलब्धि से भी जलते हैं, व्यंग करते हैं कि आजकल बहुत राधे राधे करती रहती है , सत्संग में जाती है आदि आदि ऐसे में क्या करें ? 

उत्तर :- तुमको क्या करना है ? जलन उसको हो रहा है , वो अपने जलन के आग में खुद को जला रहा है बेचारा तो जलने दो उसे । नुकसान तो वो अपना कर रहा है । तुम्हारा क्या नुकसान हो रहा है ? तुम तो gain कर रही हो और वो अपना पिछला बचा खुचा पुण्य को जला रहा है , उसके पुण्यों का क्षय हो रहा है । वो अपनी आत्म शक्ति को नष्ट कर रहा है। अगर कोई ईर्ष्या द्वेष के आग में जल रहा है तो जलने दो उसे । उसके संस्कार अच्छे नहीं हैं, इसलिए वो अपने कुसंस्कारों का प्रदर्शन कर रहा है बेचारा । 

अगर कोई व्यंग करता है तो दया के भाव से उसे देख कर नजरंदाज कर दो ।‌
समझ में आ जाएगा अगर उसका सुसंस्कार जागृत हो जाए कहीं तो, नहीं तो जल कर वो अपना हीं भारी नुक्सान कर लेगा । 
तुमको कुछ नहीं करना है और न कोई प्रतिक्रिया देनी है । तुम्हें अपना ध्यान अपने काम में लगाना चाहिए । तुमको Distract होने की कोई आवश्यकता नहीं है :- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी ( युवा शिविर- ब्रजगोपिका धाम )।

परदोष दर्शन , दुसरे कि बुराई करने से क्या हानी होती है ?


परदोष दर्शन या दुसरे की बुराई करने या सुनने से चार प्रकार के कौन कौन से महानुकसान होते है , पढ़ें इस प्रश्नोत्तर को अंत तक । 👇👇👇
पुज्यनियां मां से बच्चों का प्रश्न :- मां परदोष दर्शन का क्या मतलव है ? शास्त्र के अनुसार दुसरे का अपमान करने से, बुराई करने या सुनने से स्वयं को क्या क्या हानियां होती है ? 

उत्तर :- दुसरे में दोष यानि अवगुणों को देख कर उसका चिंतन करना , उसकी बुराई करना , उसके अवगुणों का किसी से चर्चा करना परदोष दर्शन कहलाता हैं। 
इस माया लोक यानि संसार में एक भी मायाबद्ध जीव ऐसा नहीं है जिसमें कोई न कोई अवगुण नहीं हो । संसार का हरेक वस्तू , हरेक जीव तथा हरेक संसारिक बिषय दोष पुर्ण है , एक भी शूद्ध नहीं है । 
"Everything in this world is a composition of good and evil . " 
हम दुसरे में अवगुण और स्वयं में गुण को देखते हैं यह हमारे स्वार्थी तथा दुषित नजरिया एवं अंहकार का परिणाम हैं । स्वार्थ यह कि हम अपना बड़प्पन और दुसरे को अपने से निम्न सिद्ध करना चाहते हैं । 

शास्त्र कहता है जबतक हमारे में एक भी दोष है हमें दुसरे में अवगुण देखने का हक नहीं है। किसी का अपमान करने का हक नहीं है । 

चूंकि हमारा नजरिया शूद्ध नहीं है और हम अपने उसी अशूद्ध नजरिए से दुसरे को बुरा और स्वयं को बढ़िया समझते हैं तो यह पाप है । किसी के अवगुणों कि चर्चा करने से , किसी कि बुराई करने से , अपमान करने से उसको पीड़ा होती हैं । अगर कोई तुम्हारा अपमान करता है तो तुमको दुख होता है या नहीं ? 

तुलसीदास जी ने उत्तर कांड में स्पष्ट कहा है :- 
पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥
निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर॥1॥

हमारा वेद पुरान और भागवद् आदि सभी वैदिक शास्त्रों नें यह कहा है कि दुसरे के अपमान करने जैसा पाप कोई नहीं और दुसरे को सम्मान देने जैसा धर्म नहीं कोई । 
दुसरे के अपमान से उसको पीड़ा होती है , कष्ट होता है और यह पाप है इसलिए हम इस पाप के भागीदार बनते हैं । 

इसिलिय दुसरे का अपमान तथा बुराई करने या सुनने के कारण हुए पाप से सबसे अधिक नुकसान स्वयं को होता हैं जो निम्नलिखित चार प्रकार का हैं 👇👇👇 - 
१. आत्म शक्ति क्षीण होती है । यानि आत्मबल ( shelf confidence ) कमजोर होता है जो स्वयं के सफलता में बाधक है । 
२. खुद का प्रारब्ध कमजोर होता है । भाग्य क्षीण हो जाता है । भाग्य कमजोर होने से हमे हर तरफ असफलता मिलती है ।
३. दुसरे का अपमान करने से , बुराईयों की चर्चा करने से उसके पाप का क्षय होता है और हमारे पुण्य का क्षय होता है , किया गया साधना क्षीण होती रहती है । फिर भला ऐसा काम कौन करना चाहेगा ? 
४.परदोष दर्शन से हमारा मन बुद्धि चित्त और अधिक गंदा होता है और अंत:करण के गंदा होने से हम अपने ईष्ट और गुरू के कृपा से वंचित होते हैं । हम भगवान से दुर होते जाते हैं । भगवद् कृपा मिलना बंद होने लगता है । यह सबसे बड़ा नुक्सान है ।
:- पुज्यनियां मां रासेश्वरी देवी जी द्वारा दिया गया उत्तर युवा शिविर में ब्रजगोपिका धाम में । श्री राधे ।

मनुष्य को अच्छे गुणों के लिए आध्यात्मिक होना आवश्यक है ।

हमें भगवदिए कृपा कि बात के बारे में इतना तो समझ हीं लेना चाहिए कि मानव शरीर जीव के पिछले पुण्य पुंजों का संग्रह तथा उस पर भगवान के कृपा से मिलती है । साथ साथ भगवान मनुष्य के जन्म के साथ ही उसके संचित कर्मों का कुछ हिस्सा जैसे एक दो प्रतिसत प्रारब्ध के रूप में भोगने तथा अगले क्रिया मान कर्म को करने के लिए शक्ति के रूप में दे देते हैं ।

 इस प्रार्बध विज्ञान के बारे में हमारे वैदिक शास्त्रों ने तथा वास्तविक संतो ने कहा है कि मनुष्य को भगवान से मिले प्रार्बध के रूप में अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के भाग्यों का भोग्य कर्म फल का समावेश होता है। यानि पिछले‌ तमाम मानव जन्मों में किए अच्छे और बुरे उन कर्मो के फल के रूप में हमे भाग्य मिलता है जिसे हम पिछले जन्मों में भोग नहीं पाय है ‌। और जिसे इस जन्म में हमारे द्वारा किया जाने वाला क्रियामान कर्म के अनुसार उसकी तीव्रता , अति तीव्रता तथा अगर क्रिया मान कर्म अच्छा है तो न्यूनता को भोगना परता है । अच्छा कर्म करने से तीव्र दुख भोग फल भी न्यूनतम बन भोग फल बना जाता है । 

 अत: जिस मनुष्य का क्रियामान कर्म अच्छा है तो उसका अच्छा प्रारब्ध भाग्य फल के रूप में एक्टिभ हो जाता है जिससे उसको भगवान और गुरू कि अधिक कृपा प्राप्त होने लगती है जिससे जीव हर जगह सफलता प्राप्त करते चला जाता है जिसके परिणाम स्वरूप उसे संसारिक सुख के साथ अध्यात्मिक सुख तथा गुढ़ ज्ञान भी तत्वज्ञान के रूप में भगवद् अवतार गुरू से सहज रूप से प्राप्त होने लगता है और समझ में भी आने लगता है एवं व्यवहार में भी उतरने लगता है । 

लेकिन जो जीव मुर्खता बस मानव जीवन के मुल्यों के प्रतिकूल कर्म को जैसे ही करना शुरू करता है तो उसके प्रारब्ध के दुर्भाग्य वाला भाग एक्टिभ हो जाता है और‌ वो हर जगह फिर असफलता , निराशा , दुख पाना शुरू करता है । गलत काम करने से वो प्रार्बध के शौभाग्य वाले भाग को इनएक्टिभ कर लेता है , और इस प्रकार वो भगवान तथा गुरू दोनों के कृपा से विलग हो जाता है ,‌वंचित हो जाता है , परिणाम स्वरूप दुख से उसका जीवन भर जाता है । 
ऐसा मनुष्य गलत कर्म में संलग्न होकर भगवान से प्राप्त रिसोर्सेज ( जैसे धन जन परिवार देश समाज आदि ) का दुरूपयोग करता देखा जाता है , जीवन को फुहड़ बना लेता है, गलत बिषयों में लिप्त हो जाता है । तथा भाग्य रूपी सिक्के के डार्क भाग के अनुसार हर जगह असफलता , परेशानी ,‌निराशा, डिप्रेशन तथा दुख से घिर जाता है । और दोष भगवान तथा गुरू को देता है कि हमारा लाभ नहीं हो रहा है , इस प्रकार वो भगवान तथा गुरू पर और अधिक अविस्वास और अधिक दुरी एवं फिर और अधिक दुख परिणाम में पाता चला जाता है । 

तो सबकुछ हम मनुष्यों के अपने हाथ में है । 
बड़ा आश्चर्य होता है आज देख कर अधिकतर मनुष्य मानव जीवन को स्वयं नरक बना लेता है । घटिया फिल्म , घटिया हरकत , गलत संगति , गलत खान पान, अश्लील पहनावा ओढ़ावा, गलत बिषयों में रूचि , अश्लील बातें करना , घटिया मजाक , छिछोरी हरकतें, दारू मांस मदिरा का अधिक से अधिक सेवन, गाली गलौज , गलत भाषा , फैशन के नाम पर गलत भेष भूषा, घटिया पहनावा ओढ़ावा, सस्ती लोकप्रियता के नाम पर ,मौडर्निटी के बहाने गलत विडियो बनाना ,‌ कला के नाम पर, क्रियटिभीटी के नाम पर फुहड़ नृत्य , फुहड़ फिल्म , फुहड़ विडियो , गलत तथा तथ्यहीन संभाषण करना , अश्लील भाषा का उपयोग , दुसरे पर घटिया कटाक्ष करना , झूठ बोलना , चोरी करना , हत्या करना , डाका डालना , स्वतंत्रता के नाम पर अभद्र व्यवहार, अभिव्यक्ति के आजादी के नाम पर घटिया संभाषण करना , ज्योतिष विद्या तथा धर्म के नाम पर अंधविश्वास फैलाना । राजनीति के नाम पर घटिया आरोप प्रत्यारोप करना । प्रोफेशन के नाम पर दुसरे के हित से खिलवाड़ करना , ठगना , धोखा देना । ताकत के नाम पर कमजोर को सताना । दुसरे का हक मारना । पद तथा ज्ञान के नाम पर अहंकार का पोषण करना । 
दुसरे से जलन ईर्ष्या द्वेष करना , व्यास पीठ से मिथ्या संभाषण करना , अंधविश्वासों को फैलाना ।
यह अधिकांश मनुष्यों का आदत बन चुका है आज कलयुग में और दुर्भाग्य को खूद निमंत्रण देते हैं ।

और यह सब कौन करता है ? जिसको मानव जीवन के मूल्य तथा मानविय गुणों के प्रति कोई इंटरेस्ट नहीं है । जिसको भगवान तथा गुरू पर विश्वास नहीं है , जिसको शास्त्रों तथा वैदिक संविधान पर विश्वास नहीं है । जो स्वयं को देह मानता है जीवात्मा नहीं । 

अरे भोगना तो हमको हीं होगा । कोई नहीं बच सकता । कर्म गलत करेगे हम और भोली सुरत बना कर भगवान के मंदिर में जाकर खड़े हो जाएगे , गुरू के सामने खड़े हो जाऐगे ,पुजा पाठ भक्ति का नाटक करेगें , तो हम आप क्या समझते हैं कि आप हम भगवान तथा गुरू को ठग लेगें क्या ? 

" मन गांठ कपट के खोल , हरि बोल हरि बोल हरि बोल " :- श्री महाराज जी ।

भोली सूरत दिल के खोटे नाम बड़े और दर्शन छोटे बाले हम जीवों को क्या भगवान पहचान नहीं पाते क्या ? 
हम भगवान से, गुरू से छल करेंगे तो हमारे लिए वो भी सबसे बड़ा छलिया बन जाते हैं । हम जितना शूद्ध प्रेम उनसे करेंगे तथा उनके अनुकूल आचरण करेंगे तो वो हमसे उतना ही प्रेम करते हैं , कृपा करते हैं । यह सिद्धांत श्री महाराज जी का हमें याद रखना है ।
इसलिए मानव जीवन को फुहड़ता में मत गंवाए । मानव जीवन को हल्के में हम न गंवाएं । 
श्री राधे ।