Wednesday, 13 December 2023

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। - गीता , भगवान श्रीकृष्ण ।।

अनन्यता भक्ति मार्ग के पथिकों का सबसे बड़ा आधार है अस्त्र है , साधन है । मेरा स्व अनुभव है अनन्यता तथा सततं यानि निरंतर स्मरण से व्यक्ति का उत्थान बहुत जल्दी जल्दी होता है ,
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। - गीता , भगवान श्रीकृष्ण ।। 

 अनन्यता भंग हुआ कि जो कमाया वो सब गया दो मिनट में । 
संसार में भी आज उस डौक्टर के पास , कल दुसरे डाक्टर के पास जाने से रोगी कहीं का नहीं रहता । 
और एक साथ अनेक डाक्टर का दवा खाने से भी रियेक्सन होना स्वाभाविक है। ठीक इसी प्रकार आध्यात्मिक मार्ग में जब एक बार यह निश्चय हो गया की हमारा कल्याण इन्हीं से होने वाला है तो उनको मन के द्वारा कस कर , यानि दृढ़ होकर पकड़ लेना परमावश्यक है । और केवल उन्हीं पर भरोसा करके उन्हीं के बतलाए मार्ग का सेवन करना चाहिए, अनुसरण करना चाहिए। 

कभी कभी शुरू में महापुरुष तथा भगवान श्री कृष्ण जीव के अनन्यता का बड़ी बड़ी परीक्षाऐं लेते है , कठीन कठीन एवं अनुकुल तथा प्रतिकूल परिस्थितियों को देकर , अलग अलग संत को लाकर खड़ा कर देते हैं कन्फ्यूज करने के लिए ताकि परीक्षा ठीक से हो, कभी कभी भौतिक जगत संबंधित कष्ट भी मिल जाता है परीक्षा के लिए , यानि हर तरह से परीक्षा होती है , बहुत ठोका बजाया तथा परखा जाता है अनन्यता के लिए , विश्वास में दृढ़ता का परीक्षा के लिए , श्रद्धा भाव में दृढ़ता के लिए परीक्षा , यानि हर तरह से परीक्षा , अनुकूल तथा विपरित दोनों परिस्थितियों द्वारा ।  

उस समय अगर हमारी अनन्यता भंग नहीं हुई तो बस रस मिलने लगता है , हर प्रकार से लाभ मिलने लगता है , क्योंकि वो समझ जाते हैं कि यह समझ गया है अनन्यता का रहस्य । अब कुछ भी हो जाए ये कहीं और नहीं जाने वाला । अब ये जियेगा और मरेगा सिर्फ मेरे पास । इसको अपना भक्ति और प्रेम देना ही पड़ेगा । 
फिर झट से उसको अपना लेते हैं । 
लेकिन जो भटका वो गया । वो कहीं का नहीं , न तीन में ओर न तेरह में , ऐसे को कोई नहीं पुछता । इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि -
"एक ही साधे सब सधे , सब साधे सब जाए "
हरेक महापुरूषों द्वारा मार्ग अलग अलग है , भाव अलग अलग है कोई साख्य भाव के मार्ग का पथिक हैं वो साख्य भाव का मार्ग पर अपने अनुयायियों को चलाते हैं , कोई सखा भाव मार्ग का संत हैं , कोई वात्सल्य भाव का हैं तो कोई दास भाव का तो कोई माधुर्य भाव का । 
कोई माधुर्य भाव में भी साधारणी रति के संत हैं गुरू हैं , कोई सामंजसा रति के है तो कोई समर्था रति की उपासना बतलाते है , 
समर्था रति के बहुत कम महापुरूष हुऐ हैं , अवतार लेकर आए हैं धरा धाम पर , न के बराबर , ये हज़ारों सालों में केवल एक आध बार अवतार लेकर आते हैं पृथ्वी पर उच्च कोटि के जीवों का कल्याण करने । उच्च कोटी के जीव इसलिए कि ऐसे महापुरुषों कि प्राप्ति तथा उन पर अटुट श्रद्धा और विश्वास की उत्पत्ति एक जन्म के साधना का फल तो नहीं है । 

हमारे गुरूदेव उनमें से एक है, इनके पहले पांच सौ साल पहले ये गौरांग बन कर आए थे । 
हमारे श्री महाराज जी समर्था रति में भी महाभाव भक्ति वाले रसिक संत हैं , गोलोक के वृंदावन के निभृत निकुंज रस वाले संत है , ये और भी दुर्लभ होते हैं, बड़ा दुर्लभ , दुर्लभतम होते हैं ये । भगवान श्री कृष्ण इनको अपने आंखों का पुतली बना कर पलकों में छुपा कर रखते हैं । इनसे भगवान श्री कृष्ण एक क्षण के लिए भी दुर नहीं रहते। और न रह सकते , ये कहीं जाते हैं तो श्री कृष्ण सब कुछ भूल भाल कर अपना लोक तथा श्रीमति जी को भी त्याग कर इनके पीछु पीछु चलते हैं दौड़ने लगते हैं । इनके बिना वो रह ही नहीं सकते कभी । 

'हरि के जो वल्लभ हैं दुर्लभ भुवन माझ 
तिनही के पद् रेणु आसा जिय करिहें 
योगी जपि तपि जासो मौकों कछु काम नाही
प्रीति प्रतीति रिति मेरी मति हरिहें " 

बड़ा दुर्लभ होते हैं ऐसे संत , ऐसे संत को भगवान श्री कृष्ण भी अपना वल्लभ मानते हैं । 
अत: ऐसे महापुरुष जिनको मिल गया उससे बड़ा सौभाग्यशाली जीव कोई नहीं तीनों लोकों में । 
अब इनको पाकर कोई अन्य जगह क्यों जाए । कामधेनु को छोड़ कर छेड़ी कौन दुहावे । रस मलाई छोड़ कर रसगुल्ला कौन चाहे भला । गोलोक रस वाले के रस का चस्का जिसको लग गया , वो वैकुंठ लोक के रस को क्यों चाहे , वैकुंठ भी फीका है गोलोक के रस के आगे तो भला अन्य लोक कि कामना करना वेकूफी है । यह समझने की बात है , जो समझ गया वो पा लिया । बस । :- संजीव । 
श्री राधे ।

Sunday, 10 December 2023

सुत जी ने कलयुग में होने वाले घटनाओं का जो जिक्र किया उसका भावार्थ

सुत जी ने कलयुग में होने वाले घटनाओं का जो जिक्र किया उसका भावार्थ :- 
कलयुग जैसे जैसे बीतेगी अपना प्रभाव इस प्रकार दिखलाएगी :- 

हां एक बात अवश्य होगी सभी वास्तविक तथा सच्चे धर्मनिष्ठ तथा भगवद् भक्त , वास्तविक संतों में आस्था रखने वाले जीवात्मा अपने ईष्ट और गुरू के लोक में निवास करने चले जाएंगे , उनको कलयुग के ताप से मुक्ति पहले ही मिल जाएगी । जो हमारे गुरूदेव श्री कृपालु जी महाराज या कुछ वर्तमान वास्तविक संतों के प्रति पूर्ण रूप से आस्थावान होंगे, श्रद्धावान होंगे , वे सभी मनुष्य इन घोर कलयुग के लक्षण के प्रकट होने से पहले दिव्य लोक , अपने गुरू के लोक चले जाएंगे, लेकिन जो दुष्ट प्रकृति के होंगे, उनको कलयूग का प्रभाव झेलने के लिए कलयुग में कई कई बार जन्म लेना होगा और इन कठीन पीड़ा से बार बार मरना होगा, गुजड़ना होगा यह एक अटूट सत्य है । 

1. कलयुग में मनुष्य का आत्मबल गिरने लगेगा । लोग आलसी , भोगी तथा अति विलाशी होंगे । 

2. मनुष्य झूठ पर भरोसा करेंगे और सच को स्वीकार करने से परहेज़ करेंगे । सच पर ऊंगली उठाएंगे और झूठ को गले लगायेंगे । सही रास्ता दिखाने सत्य बोलने वाला , सन्मार्ग का बात करने वाला कटु प्रतित होगा , दुश्मन कि तरह नजर आएगा और गलत मार्ग पर ले जाने वाले का लोग संगति करेंगे । गलत लोगों को लोग अपना आदर्श मानेगें , नेता मानेंगे । जो जितना चिल्लाएगा , चीख चीख कर बातें करेगा वो उतना पसंद किया जाएगा । 

3. मानव समाज , परिवार में आपसी सहयोग तथा संबंध का आभाव होगा । परिवारिक रिस्तों का कोई अहमियत नहीं होगा , झूठ , बनावट , छल , प्रपंच , इर्ष्या द्वेष से लोगों का मन भरा परा होगा । वाणी में सौम्यता के जगह जहरीले व्यंग होंगे । 

4. मनुष्य का कद काठी बौना होता जाएगा । स्त्री स्त्री से और पुरूष पुरूष से अप्राकृतिक तथा अमर्यादित व्यवहार तथा यौनाचार करेंगे । पुरूष से पुरूषत्व एवं नारी से नारित्व समाप्त हो जाएंगे । वेश्याएं पुजी जाएगीं , उनका मंदिर बनेगा । अंग प्रदर्शन स्टेटस सिंबल बन जाएगा । असली देवी देवताओं का मंदिर खंडित होंगे । जुआ शराब सम्मान का बिषय होगा । मानवीय अंगों का तस्करी तथा व्यापार होगा । 

5. मानवों में आसुरी वृत्ति का लक्षण उत्तरोत्तर दृष्टिगोचर होंगें , जो जितना झूठ बोलेगा , जितना कुकर्म करेगा , अमर्यादित तथा अमानवीय व्यवहार करेगा उसका उतना बड़ा नाम होगा । समाज में पद होगा । 

6. धन के लिए पिता पुत्र का तथा पुत्र पिता का , भाई बहन का तथा बहन भाई का , पति पत्नी का तथा पत्नी पति को धोखा देगा, मर्डर करेगा । एक स्त्री का अनेकों से संबंध होगा उसी प्रकार एक पुरूष का अनेकों से शारीरिक संबंध होगा , यहां तक कि जानवर तक से ।

7. फर्जी साधुओं का लोग चरण चुमेंगे और हाथ कि सफाई बाले बाबाओं के द्वारा दिखलाए गए चमत्कार को नमस्कार करेगे । उनके यहां कड़ोरो कि भीड़ होगी और वास्तविक संतों को शंका के दृष्टि से लोग देखेंगे । वास्तविक संतों का अपमान होगा । शास्त्रों का अपमान होगा और फर्जी तथा बात बनाने बाले साधुओं के यहां , चमत्कार दिखाकर लोगों को ठगने बाले बाबाओं के यहां लोग जाकर खूद को आध्यात्मिक दिखने तथा होने का दावा करेंगे । 

8. हर खाने कि बस्तू दूषित तथा मिलावटी होगा । खान पान जहरीली लेकिन आकर्षक दिखेंगी । नए नए लेकिन जहरीले पकवानों का अविष्कार होगा । अधिकांश लोग मांसाहारी होंगे , मानव का भी मांस पका कर खाएंगे । घरों में रसोई घर तथा स्नान घर नहीं होंगे , भोजन तथा जल के लिए एजेंसी होगी । स्नान के लिए वाशिंग मशीन के तरह वाथ मशीन होगा । 

9. मानव शरीर एक से अधिक रोगो का घर होगा , दवा के नाम पर जहर और बैद् के नाम पर डकैत डाक्टर होगा । 

10. लोगों की याद्दाश्त शक्ति अति अल्प होगी , मनुष्य मनुष्य से दूर तथा जानवरों के साथ एक ही विस्तर पर सोयेगे । 

11. कलयुग में इंसान से इंसानियत गायब होती चली जाएगी , मनुष्य से मानवता समाप्त होती जाएगी लोग वहशी होंगें । साधुओं में साधुता नहीं होगी या दिखावटी होगी । देश धर्म , राष्ट्र धर्म निभाने वालों का आभाव होगा । धर्म , न्याय नीति , नैतिकता पर धन हावी होगा । अधिकतर धार्मिक संस्थानों में धन वाले का सम्मान होगा और निर्धनों का प्रवेश वर्जित होगा । इन्हें भंगी समझा जाएगा । 

12. कलयुग में धर्म कर्म के नाम पर कुकर्म होगा । तीर्थ में व्यभिचार होंगे , यौनाचार होंगे । 

13. निति, नैतिकता न्याय का कोई जगह नहीं होगी । 

14. फुलों से खुशबू , मसालों से उसका स्वाद , औषधी से उसका औषधीय गुण , यानि रोग निरोधक प्रभाव समाप्त होते चला जाएगा । 

15. अनेक नए नए रोग उत्पन्न होगा जो लोगों को काल के मुख में भेजेगा । 

16. खेत से उपजाऊपन , अन्न से अन्नरस , वृक्षों से फल देने कि क्षमता , गाए से दुध, उत्पादन कि क्षमता समाप्त होने लगेगी । 

17. तरह तरह के विध्वंशक विनाशकारी हथियार का निर्माण होगा जो स्वयं के विनाश का कारण होगा । 

18. अति वृष्टि, अनावृष्टि, जलजला , भयानक से भयानक तुफान , भयानक बाढ़ तथा सुनामी जल्द जल्द उत्पन्न होगा । पहाड़ दड़कने लगेगा , वर्फ का पहाड़ तेजी से पिघलने लगेगा । रेगिस्तान का क्षेत्रफल बढ़ने लगेगा । दिन का समय छोटा होगा , रातें बड़ी होंगी । 

19. मशीन में बच्चे पैदा होंगे , गर्भ धारण करना एक इतिहास बन जाएगा । 
विचार विवेक बुद्धि हीन बच्चे पैदा होंगे , उनका दिमाग मशीनी होगा जो भावनात्मक शून्य होंगे , संस्कार , चरित्र आदि शब्द लुप्त हो जाएंगे । बच्चा जो अपने पैर पर खड़े होते ही मां वाप को पशुओं के तरह छोड़ कर अलग हो जाएंगे हमेशा के लिए । 

20. वाइलोजिकल जरूरत जैसे सेक्स , नींद , सांसें तथा भोजन आदि को मशीन से पुरा करेंगे , लोग संवेदनहीन होंगे ।

21. मनोरंजन के विशुद्ध साधन के जगह लोग अमार्यादित नृत्य संगीत , तथा नाटक से अपना रंजन करेंगे । 

22. असली नकली का पहचान लोगों को नहीं होगा । कलयूग का दस हजार सात सौ साल वितने के साथ हीं मानव सभ्यता लुप्त हो जाएगा, पर ग्रही जीवों का आक्रमण होगा , सबकुछ तहस नहस हो जाएगा पृथ्वी पर । पृथ्वी पर केवल भोग योनि के जीव कीट पतंग तथा जानवरों का शासन होगा , सभी अधर्मी मानव जानवर शरीर में जन्म लेंगे कर्म भोग के लिए , ये जानवर कुछ कुछ मनुष्य कि तरह दिखेंगे । पृथ्वी पर जानवरों का शासन चार लाख तिरेपन हजार तीन सौ बर्ष तक रहेगा , उसके बाद पृथ्वी समाप्त । 

23. रिस्तों में वाणी कि मधुरता के जगह कर्कशता का समावेश होगा । दर्पण झूठ बोलेगी । 

24. वेद शास्त्र, असली संत , फल तथा छाया प्रदान करने वाले बृक्ष एवं निर्मल सरिता नदी तालाब लूप्त हो जाएंगे । शास्त्रों को तोड मोड़ कर पेश करेंगे बहुरूपिए पंडित । बड़ी संख्या में ब्राह्मण मांस भक्षि होंगे । चंडाल प्रवचन करेंगे । अधिकतर ब्राह्मण उसका चरण धोकर पिएंगे , उनको अपना आदर्श मानेगें । शास्त्रों के नाम पर चंडाल मिथ्या प्रवचन करेंगे । 

25. लोग या तो जमीन के निचे चुहे कि तरह या गगन चुंबी इमारत में कबुतर के भांति निवास करेंगे और सर्दी एवं गर्मी से उम्र कमतर होगी । शरीर दुर्बल होगी । लोग हवा में उड़ेंगे । 

अंत में ब्रह्मांड कि गति अनियमित तथा अनियंत्रित हो जाएगी एवं एक भयानक विस्फोट होगा ब्रह्मांड में , ग्रह से ग्रह टकराएंगे और सृष्टि का महाप्रलय होगा । 

हां एक बात अवश्य होगी सभी वास्तविक तथा सच्चे धर्मनिष्ठ तथा भगवद् भक्त , वास्तविक संतों में आस्था रखने वाले जीवात्मा अपने ईष्ट और गुरू के लोक में निवास करने चले जाएंगे कल्युग के प्रारंभिक अवस्था में ही , उनको कलयुग के इन तापों से , घटनाओं से मुक्ति पहले ही मिल जाएगी ।
:- सोर्स - पद्म पुराण , गरूड़ पुराण एवं भविष्य पुराण । 
यह सभी बातें सत् प्रतिसत होके रहेगी । कुछ कुछ दिखने भी लगा है आजकल । 
:- संजीव कुमार ।

Wednesday, 6 December 2023

एक व्यक्ति ने पुछा कि भगवान सबके ह्रदय में रहते हैं हमेशा और मरने के बाद हम जहां जहां जाते हैं जिस योनि में जाते हैं , या स्वर्ग में जाते हैं या नरक में जाते हैं तो वो भी तो हमारे साथ साथ जाते हैं अतः उनको भी तो हमारे साथ सुख दुख झेलना पड़ता है, चाहे वो स्वर्ग का सुख हो या नरक का ?

एक व्यक्ति ने पुछा कि भगवान सबके ह्रदय में रहते हैं हमेशा और मरने के बाद हम जहां जहां जाते हैं जिस योनि में जाते हैं , या स्वर्ग में जाते हैं या नरक में जाते हैं तो वो भी तो हमारे साथ साथ जाते हैं अतः उनको भी तो हमारे साथ सुख दुख झेलना पड़ता है, चाहे वो स्वर्ग का सुख हो या नरक का ? 

उत्तर :- हां ये सत्य है कि भगवान हर जगह , हर योनि में , हर शरीर में हमारे साथ साथ जाते हैं , हमारे साथ साथ रहते हैं, यहां तक कि स्वर्ग हो या नरक , सभी जगह वो जीवात्मा के साथ साथ जाते हैं तथा हर क्षण रहते हैं । लेकिन वो सुख दुख नहीं भोगते ,‌वो भोगवाते है । माईक सुख दुख हमें भोगवाते है फल देकर ।

कर्ता हम है अपने कर्मो का और भगवान नोट कर्ता है हमारे कर्म का और फल दाता हैं 
वो हमारे कर्म का जिम्मेदार नहीं हैं , हम जैसा संकल्प करते हैं और फिर जो कर्म करते हैं ,उसको वो नोट करके फल देते हैं सिर्फ , वो हमारे कर्म का भोग फल नहीं भोगते साथ रहने के बाबजूद भी । 
वो तो आनंद है , सदा आनंद में रहते हैं और सभी जीवात्मा के साथ साथ रहते हैं हमेशा लेकिन अपने अहंकारवश , देहाभिमान के कारण अपने कर्म का कर्ता हम स्वयं है , साथ रहने के बाबजूद भी उनसे हमारा मन का कनेक्शन नहीं है , हमारे मन का कनेक्शन हमारे देह , हमारे देह के रिश्तेदारों और संसार से है , इसलिए हम मायाबद्ध जीवों का कर्ता वो नहीं है , इसलिए हमारे कर्म के अनुरूप वो फल देते हैं और भोगवाते है इसी संसार में , स्वर्ग में या नरक में भी । 

हां महापुरुषों के अंदर भी वो हैं लेकिन महापुरुषों का आत्मा और मन का पुरा कनेक्शन भगवान के साथ है हर क्षण है । संतों एवं महापुरुषों के आत्मा और मन अपने अंदर बैठे भगवान के साथ अटैच है,‌वो संसार में रहते हुए भी संसार , देह और देह के रिश्तेदार और कर्म से डिटैच्ड है और हर क्षण भगवान से अटैच्ड है इसलिए उनके सभी कर्म का कर्ता भगवान है , अत: जब उनके सभी कर्मों का कर्ता भगवान हैं तो फिर उनके कर्मों को नोट करने और फल देने का सवाल ही‌ नही‌ उत्पन्न होता । 

इसलिए तुलसीदास जी ने संतों और महापुरुषों के बिषय में कहा है कि :- 

"होईहैं वही जो राम रची रखा , को करि तर्क बढ़ाबहि साखा "

यानि महापुरुषों के सभी कर्म , संकल्प , कर्म का डिसीजन भगवान के हाथ में है, इसलिए महापुरूषों को अपने कर्म का चिंता नहीं रहता कभी । महापुरुषों के लिए कर्म का चुनाव, कर्म करना सब भगवान हीं रचते हैं करते हैं । महापुरुषों को कर्म से कोई मतलव नहीं और न कर्म कि चिंता होती है । 

इसलिए महापुरूषों के लिए उन्होंने फिर कहा है :- तुलसी भरोसे राम के निर्भय होके सोये' ।
महापुरूष को कोई भय नहीं , न कर्म कि चिंता और न फल की इच्छा , इसलिए तुलसी सरिखे महापुरूष ही निर्भय होके सोने का अधिकारी है , हमारे जैसे माया बद्ध जीव नहीं , जीवात्मा जब तक संसार और अपने देह से अटैच्ड है तब तक उसको कर्म तथा कर्म फल का भय रहेगा , वो भयभीत रहेगा ही । 

मायाबद्ध निर्भय होके नहीं सो सकता क्योंकि वो आनंद में नहीं है, भगवान से मन अटैच नहीं ,‌वो इस मृत्युलोक के समस्त माया जनित रोगों के भोगों से कर्मफल के रूप में प्राप्त संसारिक सुख दुख के भय भयभीत रहेगा , रहना पड़ेगा, कोई बच नहीं सकता चाहे वो पृथ्वी का सम्राट या मायाबद्ध स्वर्ग का भी सम्राट क्यों न हो , सब मायाबद्ध अपने अपने कर्मों के रिश्क पर है। अगर कोई मायाबद्ध जीव , चाहे वो पृथ्वी का सम्राट क्यों न हो , या भारी क्रिमिनल क्यों न हो कहता है कि मैं निर्भय हुं , निडर हुं तो वो मुर्ख है , उसे नहीं पता कि वो उदंड है , निडर नहीं , संसार में जिसके पास जितना अधिक संसारिक वैभव है वो उतना भयभीत हैं उसे वैभव खोने का डर सबसे अधिक है अपेक्षाकृत उसके , जिसके पास कुछ नहीं , जो रोड पर सोता है । 

"भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्भयं ।
माने दैन्यभयम्, बले रिपुभयम्, रूपे जराया भयम् ।
शास्त्रे वादिभयम्, गुणे कलभयम्, काये कृतान्ताद्भयंसर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम् ॥ 
संसार में समस्त दुखों तथा भय का एक मात्र कारण जीवों का संसार से मोह है , अटैचमेंट है । "(Bhartrihari from the Vairagya shatakam)

जो जितना संसार से अटैच्ड है वो उतना भयग्रस्त है , चिंताग्रस्त हैं , परेशान हैं , दुखी है , और रहेगा । और जो जितना, जिस मात्रा में संसार से डिटैच्ड है तथा भगवान से अटैच्ड है वो उसी मात्रा में आनंदित है , भय रहित है , चिंता रहित है , दुख रहित है और रहेगा , सीधा सा हिसाब है । 

ये महापुरुषों के द्वारा जो कहा गया है कि -
 "चाह गई चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह' 
जाके कछु नहीं चाहिए, वे साहन के साह” 

ये सब भगवद् प्राप्त महापुरुषों के लिए है कहा गया है , यह मायाबद्ध मनुष्य के लिए अप्लीकेबल नहीं है , भ्रम में न रहें । मायाबद्ध कभी वेपरवाह हो ही नहीं सकता , न चाह यानि कामना मिट सकती है और न चिंता मिट सकती है । 

इसलिए तुलसीदास जी ने हम मायाबद्ध जीवों तथा संसार के लिए फिर कहा है कि :- 

कर्म प्रधान विश्व करि राखा , जो जस करही सो तस फल चाखा । 

यह श्लोक हम मायाबद्ध जीवों के लिए अप्लीकेबल है । 
मायाबद्ध जीव जैसा संकल्प करता है ,जैसा कर्म करता है भगवान नोट करके फल देते हैं और फिर भोगवाते भी है , कोई बच नहीं सकता है ।

वहीं वो महापुरुषों के सभी कर्म को स्वयं करते हैं , महापुरूष हमेशा भगवान यानि आनंद में रहते हैं , संसार में रहते हुए भी संसार से डिटैच्ड और भगवान से 100% अटैच्ड रहते हैं । 
संसार में उनके द्वारा जो भी कर्म होता या किया हुआ दिखाई पड़ता है हम साधारण जीवों को , वो भगवान के द्वारा किया जाता है , महापुरुषों के द्वारा नहीं । 
यही अंतर है । :- श्री महाराज जी द्वारा दिए गए तत्वज्ञान के आधार पर । श्री राधे ।

Tuesday, 5 December 2023

हार-जीत, सफलता-असफलता , हानी-लाभ,जीवन-मरण,यश-अपयश, सुख-दुख सब बिधि हाथ यानि भगवान के हाथ में है तो फिर मनुष्य के हाथ में क्या है ?

प्रश्न :- हार-जीत, सफलता-असफलता , हानी-लाभ,जीवन-मरण,यश-अपयश, सुख-दुख सब बिधि हाथ यानि भगवान के हाथ में है तो फिर मनुष्य के हाथ में क्या है ? 

उत्तर :- कर्म , मनुष्य केवल कर्म करने का अधिकारी है, इच्छित फल की प्राप्ति मनुष्य के हाथ में नहीं है । 
भगवान ने मनुष्य को केवल तीन बिषय में स्वतंत्रता प्रदान किए हैं यानि तीन अधिकार दिए हैं सृष्टि के समय और इसमें वो कभी हस्तक्षेप नहीं करते । वो तीनों निम्नलिखित हैं :- 

1.कर्म के चुनाव का अधिकार-मनुष्य को कर्म  चुनाव करने का अधिकारी है । वो चाहे अच्छे कर्म का चुनाव करें या बुरे कर्म का चुनाव करें , यह मनुष्य के अपने हाथ में है। 

2. चुनें हुए कर्म को करने का संकल्प , यानि कर्म का प्रयोजन का अधिकार तथा कर्म करने का नियत तथा निति का अधिकार - भगवान ने मनुष्य को दुसरा अधिकार दिया है उसके चुने हुए कर्म को करने का संकल्प करने का अधिकार, इसमें भी भगवान कभी हस्तक्षेप नहीं करते । अच्छा नियत है , अच्छा नियत से कर्म करने का संकल्प किया गया है मनुष्य के द्वारा तो अच्छा फल भगवान देते हैं , बुरा कर्म किया तो बुरा फल मिलता है । 

3. तीसरा और अंतिम अधिकार मनुष्य को भगवान से मिला है वो है कर्म करने कि शक्ति, बुद्धि, बल तथा क्षमता । 

लेकिन फल के चुनाव का अधिकार मनुष्य को नहीं है । कर्म के चुनाव , संकल्प और कर्म करने के बाद कर्म के अनुरूप तथा प्रारब्ध के मिश्रण के अनुसार भगवान फल देते हैं । यही फल हार-जीत, सफलता-असफलता , हानी-लाभ,जीवन-मरण,यश-अपयश, दुख-सुख , के रूप में प्रत्येक मनुष्य को मिलता है । और भोगना पड़ता है उसे क्योंकि भोगने के चुनाव का अधिकार मनुष्य को नहीं है । जो कर्म फल भगवान के द्वारा मिला है उससे कोई बच नहीं सकता । 

"कृतितव्य: भोगतव्यं," कर्म फल भोगना ही पड़ेगा । 
 'जस करनी तस भोगहु ताता, 
चाहे वो कितना बड़ा राजा क्यूं न हो । 

सार यह कि मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है तो भगवान फल देने में स्वतंत्र है लेकिन मनुष्य कर्म फल भोगने में स्वतंत्र नहीं हैं । फल भोगना ही पड़ेगा । कर्म फल किसी का पीछा नहीं छोड़ती । 

भगवान ने गीता में स्पष्ट रूप से कहा है कि :- 
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।2.47।। गीता । 
:- श्री महाराज जी द्वारा "कर्म तथा भोग सिद्धांत पर दिए गए प्रवचन का सार ।

क्या उत्सव मनाने से आध्यात्मिक लाभ है

प्रश्न :- क्या उत्सव मनाने से आध्यात्मिक लाभ है ? 
उत्तर :- अगर उत्सव के पीछे के मूल सिद्धांतों को जानने तथा अपने जीवन में लागु करने से हम वंचित हैं तो चाहे जितना उत्सव मनाया जाए , सब लोक रंजन है , मनोरंजन है , उसका कोई आध्यात्मिक लाभ नहीं है ।
 हम महापुरुषों का प्राकट्य उत्सव मनाते हैं , पुण्य तिथि मनाते हैं , होली , दिवाली , दुर्गा पुजा , छठ , गुरू पूर्णिमा, शरद पुर्णिमा, रामनवमी , जन्माष्टमी, राधाष्टमी, शिवरात्रि, हनुमान जयंती, ये दिवस , वो दिवस ,  प्रकाशोत्सव आदि कोई भी उत्सव मनाते हैं लेकिन इन उत्सवों के पीछे का सिद्धांत ज्ञान , तत्वज्ञान आदि को नहीं जानते , उसमें दिलचस्पी नहीं है , उसको व्यवहार में लाने का प्रयास नहीं है , हरि और गुरू से अटैचमेंट न हो , प्रेम न हो तो सिर्फ उत्सव चाहे कितना मना ले , यह केवल अपने मनोरंजन मात्र के लिए है इसका कोई लाभ मिलने वाला नहीं है । 
महापुरुषों के मूर्ति को या भगवान के मूर्ति को स्थापित करके , उन पर फुल , माला चढ़ाना , बैंड बजाना , आरती करना, उछलना , कुदना नाचना , गाना  तब तक सार्थक नहीं जब तक उनके बतलाए मार्गों पर चलने में दिलचस्पी न हो ।

यह तो ऐसा ही हुआ कि एक व्यक्ति अपने पिता के मुर्ति या फोटो को सोने में मढ़वा कर प्रति दिन फुल चढ़ाए , पुजा करें , उनका जन्मदिन पर उत्सव करें , भोज का आयोजन करें , लेकिन पिता के बतलाए मार्ग को न अपनाएं , उनके आदेशों का पालन न करें , उसके सिद्धांतों कि अवहेलना करें । 
भला कौन ऐसा पिता खुश होगा जिसका संतान धूमधाम से उनका जन्म दिन मनाए लेकिन पिता के आदेशों के विपरित चले , आदेशों के खिलाफ काम करें , उनके अपेक्षा पर खड़ा न उतरे । 
संसार में भी कोई माता पिता इन बातों से खुश नहीं हो सकता कभी । 
तो भला भगवान और गुरू कैसे खुश होंगे  उनका शिष्य गुरू पूर्णिमा मनाए , उनका जन्मोत्सव मनाए , नाचे कुदे , उछले गाए , उत्सव मनाए लेकिन उनके सिद्धांतों से दुर रहे , बतलाए मार्गों का अबलंब न लें । 
तो ऐसे पुजा , आरती , उत्सव से कोई लाभ नहीं । 
गुरू और भगवान को सुख तो तब मिलता है जब कोई शिष्य या अनुयायी उनके सिद्धांतों का पालन करता है , उनके बतलाए मार्गों पर चलने का प्रयास ह्रदय से करता है । तभी कृपा होती है , तभी उत्सव का फल मिलता है । तभी उत्सव सार्थक होता है । 
श्री राधे ।

भगवद् कृपा का पैमाना :

भगवद् कृपा का पैमाना :- 
वास्तविक महापुरुषों से मिलन के बाद अगर किसी को और अधिक संसार मिल रहा है और वो इसको भगवद् कृपा समझ रहा है, गुरू कि कृपा मानता है तो यह एक बहुत बड़ी अज्ञानता तथा भ्रम है, गलत धारणा है । 
क्योंकि श्री कृपालु जी महाप्रभु ने शास्त्रीय सिद्धांतों को समझाते हुए हमें बतलाया है कि भौतिक बस्तूएं यानि संसार का समान तो जीव को अपने पुर्व जन्म में किए कर्म यानि प्रारब्ध, भाग्य एवं इस जीवन में किए जा रहे क्रियामान कर्मों से मिलता है कर्म फल के रूप में । 
भगवद् कृपा , महापुरुषों की कृपा , भगवान की असली कृपा तो तब मानना चाहिए जब अनुभव में आए कि गुरू कृपा से हमारी संसारिक कामनाएं कितनी कम हुई है , या धीरे धीरे समाप्त हो रही है । 
संसार से अटैचमेंट कितना समाप्त हुआ, कम हुआ और भगवान से , गुरू से कितना प्रेम बढ़ा यह असली पैमाना है कृपा को मापने का । जिस मात्रा में गुरू निर्दिष्ट हमारी साधना होगी , सिद्धांतों का श्रवन होगा , चिंतन होगा , उसको व्यवहार में लाने का प्रयास होगा उतना लाभ होगा , उतनी कृपा बढ़ेगी , उतना आनंद मिलेगा , अशांति समाप्त होगी तथा जीवन में सकुन , आनंद बढ़ेगा ।। 
अगर संसार अधिक मिलने लगा और इसी को हम कृपा मान रहे हैं तो इसका मतलव संसार से हमारा अटैचमेंट बढ़ गया है । और यह तो बड़ा भारी अध्यात्मिक नुकसान है । यह कृपा नहीं है । जितना आज अधिक संसार मिलेगा , भौतिक संपत्ति मिलेगी , कल के लिए वही दुख का कारण बनने बाला है निश्चित रूप से । क्योंकि भौतिक सामान अस्थाई होता है , आज धन है, रूप है योवन है , पद् है, प्रतिष्ठा है , यश है , हर तरफ से सम्मान मिल रहा है, भौतिक साधन है , भौतिक सुख मिल रहा है कल जब नहीं होगा तब पता चलेगा , तब बहुत दुख होगा । संसारिक सुख आज जिसके पास है कल नहीं रहने वाला , उसी प्रकार संसारिक दुख भी आज जिसके पास है कल नहीं रहने वाला , यह परिवर्तनशील है, अस्थाई है । अत: जो भौतिक बस्तुओं कि प्राप्ति , पद प्रतिष्ठा, पोजिशन को भगवान या गुरू कि कृपा मानता है उससे बड़ा मुर्ख दुनिया में कोई नहीं । 
भगवद् कृपा से तो भगवदिए सुख , आनंद मिलता है जो स्थाई है तथा प्रतिपल बढ़ने वाला होता है । और संसार अधिक मिलने लगा एवं उसमें अटैचमेंट बढ़ने लगा तो समझ लीजिए हम आप बड़े खतरे में है , अधिक संसार पाकर जितना आपको खुशी मिल रहा है , निश्चित हम आप कल उतना अधिक दुख पाने वाले हैं । अत: सावधान ।
श्री महाराज जी का सिद्धांत है कि संसार से जिस मात्रा में अटैचमेंट कम होता है उसी मात्रा में भगवान से , महापुरुष से प्रेम बढ़ता है , अत: भगवान और गुरू से प्रेम का बढ़ना कृपा है । 
संसार अधिक मिलना कृपा नहीं है यह खतरा है , आने वाला भावी दुख का संकेत है । :- हमारे गुरूदेव श्री महाराज जी से प्राप्त सिद्धांत ज्ञान । 
श्री राधे ।

Monday, 4 December 2023

इस कलयुग में संसार में सभी माया बद्ध मनुष्य के स्वयं के स्थिति के बारे में ठीक से पता नहीं है कि उसके स्वयं का अंत:करण कितना गंदा है ईर्ष्या द्वेष छल कपट , काम क्रोध भरा परा है हर किसी में, चाहे वो कितना भी बड़ा संसारिक ज्ञानी या पंडित क्यों न हो ?

संसार में जब एक मनुष्य दुसरे मनुष्य के भेष भूषा बाहरी स्थिति तथा व्यवहार को देखकर उसके अंदर के अंत:करण को ठीक ठीक नहीं जान सकता तो भला वो किसी वास्तविक महापुरुष को, संत को कैसे जान सकता है या समझ सकता है अपने सीमित बुद्धि से ? महापुरुषों के व्यवहार तो और भी अटपटे होते हैं बाहर से । साधारण जीव कोई अंतर्यामी है जो वो किसी के बाहरी भेष भूषा तथा व्यवहार से उसके अंदर की स्थिति जान ले ?

 इस कलयुग में संसार में सभी माया बद्ध मनुष्य के स्वयं के स्थिति के बारे में ठीक से पता नहीं है कि उसके स्वयं का अंत:करण कितना गंदा है ईर्ष्या द्वेष छल कपट , काम क्रोध भरा परा है हर किसी में, चाहे वो कितना भी बड़ा संसारिक ज्ञानी या पंडित क्यों न हो ? वो भला दुसरे को क्या सर्टिफिकेट देगा ? अगर कोई ऐसा करता है तो समझ लेना चाहिए कि उसके स्वयं का गंदा चित्त चरित्र दुसरे के आईने में प्रतिबिंबित होता है। दुसरे का दोष देखना , उसको गनना ये सिद्ध करता है कि वो स्वयं उतना हीं बड़ा दोषी है जितना दोष उसको दुसरे में दिखाई देता है । बड़ा गंदा है उसका अंत:करण । 

"अत: जब तुम्हारा अपने गुरू के उपर दृढ़ विश्वास है, पुर्ण श्रद्धा है, समर्पण है , हर क्षण सेवा की भावना है, अनन्यता है तो फिर दुसरा तुम्हारे और तुम्हारे गुरू के बारे में क्या कहता है इसकी चिंता तुम्हें कभी नहीं करना चाहिए। न उससे तुम्हें उलझना चाहिए और न विचलित होना चाहिए। 

हमेशा यह सोचना चाहिए कि कलयुग तो क्या जब त्रेता में भगवान श्री राम कि भी आलोचना करने वाला अज्ञानी एवं अहंकारी जीव था , जब द्वापर में भगवान श्री कृष्ण को भी भला बुरा कहने और उनके बारे में गलत-सलत बोलने वाला नादान अधम जीव था तो भला आज इस भ्रष्टयुग के भटके हुए जीव वास्तविक महापुरुष को भला कैसे समझ सकता हैं । " :- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी । 

गोस्वामी जी कहते है :- 
जाने बिनु न होई परतीति, बिनु प्रतीति होइ नही प्रीति। 
प्रीति बिना न भक्ति दृढ़ाई, जिमि खग पति जल के चिकनाही।। 

अर्थात ईश्वर को जाने बिना हमारे भीतर विश्वास नही आ सकता है, और विश्वास के बिना प्रेम प्रकट नही हो सकता है। प्रेम व विश्वास के बगैर भक्ति दृढ़ नही हो सकती है। 
इसलिए अगर कोई अधम जीव किसी भी वास्तविक महापुरुषों के बारे गलत बातें करता है तो मान लिजिए वो भगवान के कृपा से वंचित हैं । इसलिए बेचारा ऐसी गंदी बातें सोचता है ,बोलता है और दुसरे से करता है । 

"जाकि रही भावना जैसी, प्रभु मुरत देखी तीन तैसी "

जिसकी जैसी भावना है , जितना अंत:करण गंदा है , जितना चरित्र गंदा है वो तो उसी भावना से भगवान और भगवद् महापुरूष के बारे में अनुमान लगाता है , गंदी बातें बोलता है और दुसरे गंदे लोग उससे सुनके पतियाते है । इसमें कोई आश्चर्य नहीं । यह समझना चाहिए कि महापुरुषों के बारे में गलत बोलने वाला और सुनने वाला , तथा पतियाने वाला जीव अपने पतन की ओर, विनाश कि ओर हीं स्वयं अग्रसर है । 
श्री राधे ।