Saturday, 3 February 2024

एक व्यक्ति ने जिज्ञासा कि है कि महापुरुषों को प्रथम दृष्टया कैसे पहचानें ?

एक व्यक्ति ने जिज्ञासा कि है कि महापुरुषों को प्रथम दृष्टया कैसे पहचानें ? 
यूं तो महापुरुषों को पहचानना काफी दुष्कर कार्य है , वो भी कोई अगर भाव हीन है तो और भी कठीन काम है । क्योंकि महापुरुषों के क्रिया कलाप मुद्रा , भाव भंगिमा आदि अटपटे होते हैं , समझ से परे होते हैं । उनके शरीर भेष भुषा प्राकृत तथा कार्य लोकवत दिखाई देने के बाबजूद भी अलौकिक होते हैं , दिव्य होते हैं जो आमजनों के समझ से परे होते हैं । जिस पर वो स्वयं कृपा कर दे वही जीव उनको जान सकते हैं , समझ सकता हैं ।‌ नही तो बिना कृपा के उनको पहचानना काफी कठीन कार्य है । 

फिर भी शास्त्र के अनुसार , महापुरूष के ही दृष्टि से हम उनको चार प्रकार के गुणों से प्राथमिक तौर पर कुछ कुछ पहचान सकते हैं, अनुमान लगा सकते हैं :- 

स्वर्गस्थितानामिह जीवलोके चत्वारि चिह्नानि वसन्ति देहे।
दानप्रसङ्गो मधुरा च वाणी देवार्चनं ब्राह्मणतर्पणं च, 
श्रोत्रियम ब्रह्मनिष्टम् तथैव च ।। 

इस श्लोक में शास्त्र कहता है कि यूं तो महापुरुषों की पहचान आम व्यक्ति के लिए तो क्या स्वर्ग के देवी देवताओं के लिए भी काफी कठीन है, फिर भी उनकी पहचान 4 प्रकार के गुणों से की जा सकती है‌।

 महापुरुषों में दानशीलता, मधुर वाणी, ईश भक्ति तथा सेवा भाव की भावना एवं भक्ति मार्ग का प्रेरक, निरीक्षक, रक्षक, निडर, भगवद् भक्त के प्रति करूणा का भाव, दया का भाव, कृपा कारक तथा जीव कल्याण की भावना से ओत प्रोत तथा जो श्रोत्रिय यानि सभी शास्त्रों का शास्त्रज्ञ भी हो , अति विद्वान भी हो तथा ब्रह्मनिष्ठ यानि भगवान को प्राप्त भी कर चुके हो या स्वयं साक्षात् भगवद् स्वरूप हो , जिनमें इन 4 प्रकार के गुणों का समावेश होता है। जिन लोगों में ये 4 प्रकार के गुण स्पष्ट रूप से दिखाई दे उनका मूल्यांकन महापुरुषों की श्रेणी में किया जाता है । 

महापुरूष के कई प्रकार होते हैं । नित्य सिद्ध , साधन सिद्ध और स्वयं भगवान के अवतार महापुरूष। 

अत: यदि और भी गहराई में जाना चाहेंगे तो जिनमें अष्ट महा सात्विक भावों का उद्रेक हो , वो महापुरुष भगवान के डाईरेक्ट अवतार महापुरूष होते हैं । ये बहुत अधिक दुर्लभ होते हैं ।

जिन काल खंड में भगवान ऐसे दुर्लभ ( श्री गौरांग महाप्रभु तथा श्री कृपालु महाप्रभु जी जैसे ) महापुरूष के रूप अवतार लेकर जीव कल्याण के लिए धरा धाम पर आते हैं तो उसी कालखंड में हजारों जन्मों से प्रतीक्षारत परम भाग्यशाली जीव भी मनुष्य के शरीर में उनकी हीं कृपा से जन्म लेते हैं जिस पर वो कृपा करते हैं और गुरू बन कर वो उन जीवों को प्राप्त होते हैं, स्वयं उसका मार्ग दर्शन करते हैं और साधना सेवा आदि करवाते हैं । 
ऐसे जीव अति शौभाग्यशाली होते हैं जिनके जीवन काल में भगवान स्वयं महापुरूष रूप में , गुरू रूप में अवतार लेकर धरा धाम पर आते हैं और अपनी कृपा के फलस्वरूप उनको प्राप्त होते हैं । बिना हरि कृपा के ऐसे अवतारी दुर्लभ महापुरूष का मिलना असंभव है । 
विभिषण जी ने स्वयं कहा हनुमान जी से प्रथम भेंट में श्रीलंका में :- 
"अब मोहि भा भरोस हनुमंता,
बिनु हरिकृपा मिलहिं नहीं संता ।।"
बिना‌ हरि कृपा के ऐसे दुर्लभ महापुरूष मिलना असंभव है । 
अत: हमें स्वयं को बहुत गौरवान्वित महसूस करना चाहिए कि हम श्री कृपालुजी महाराज के अवतार काल में न केवल जन्म लिए वल्कि उनकी अनुकंपा से उनको गुरू रूप में प्राप्त भी किए । इस प्रकार हमलोग भगवान को प्राप्त कर चुके हैं, देख चुके हैं , उनको छु चुके हैं , उनसे बातें की , उनकी वाणी सुनी । अब जरूरत है केवल सौ प्रतिशत रियलाईजेशन की और निष्काम सेवा वासना बढ़ाने की , रो रो कर उनसे उनके दिव्य लोक में उनकी दिव्य सेवा प्राप्त करना अंतिम लक्ष्य है अब । 
श्री राधे ।
:- श्री महाराज जी से प्राप्त तत्वज्ञान के आधार पर ।

प्रश्न: महापुरुष संसार में रहते हैं, आते हैं। ये कष्ट का संसार है, गन्दा संसार। सब मायाबद्ध गड़बड़ लोग यहाँ रहते हैं, उसमें महापुरुष आते क्यों हैं?

प्रश्न: महापुरुष संसार में रहते हैं, आते हैं। ये कष्ट का संसार है, गन्दा संसार। सब मायाबद्ध गड़बड़ लोग यहाँ रहते हैं, उसमें महापुरुष आते क्यों हैं?

महापुरुषों में बहुत प्रकार के महापुरुष होते हैं। कुछ अवतारी महापुरुष होते हैं, कुछ साधन सिद्ध महापुरुष होते हैं लेकिन कष्ट किसी महापुरुष को नहीं होता। बाहर का जो भी स्वरूप हो शारीरिक रोग का या बाप मरे, बेटा मरे, कुछ हो उनको भीतर से कष्ट नहीं होता। एक फार्मूला याद कर लो। तुलसीदास को संग्रहणी हुई मर गये, रामकृष्ण परमहंस को कैंसर हुआ मर गये और वैसे भी हमेशा बुखार-वुखार सब ये होता रहता है शरीर जब तक है, लेकिन भीतर से कष्ट नहीं होता उनको। "ज्ञानी भुगतै ज्ञान ते मूरख भुगते रोय" सबका बाप, बेटा, स्त्री, पति मरेंगे अपने समय पर लेकिन महापुरुष को फीलिंग नहीं होगी और मायाबद्ध को फीलिंग होगी इतना सा अन्तर है। और तुमको महापुरुषों की फिकर क्यों है? अपनी फ़िकर करो। कितने ही महापुरुषों को संसार वालों ने जेल भेज दिया, पिटाई किया। कितने- कितने नाटक हुए हैं- प्रह्लाद वगैरह को, मीरा वगैरह को, सब इतिहास भरा पड़ा है। लेकिन वो भीतर से दुःखी नहीं हुये, बाहर से सब दिखाई पड़ रहा है और बहुत से महापुरुषों ने अपने भक्तों का कष्ट ले लिया है। बहुत सी बातें हैं उसमें बारीक। महापुरुष और भगवान् की बातें न पूछो, न सोचो, न अकल लगाओ। वो बुद्धि से परे हैं।

भागवत में लिखा है कि श्रीकृष्ण ने १६,१०८ ब्याह किया और एक-एक स्त्री के दस-दस बच्चे हुए और सौ वर्ष के बाद उनको वैराग्य हो गया। रामायण पढ़ते हो? लक्ष्मण के वियोग में राम रो रहे हैं-बाकायदा रो रहे हैं और सीता के वियोग में तो बहुत ही बुरा हाल। सब एक्टिंग है। भगवान् और महापुरुष जो हैं नम्बरी चार सौ बीस होते हैं समझे रहो। "भगवत् रसिक रसिक की बातें रसिक बिना कोउ समुझि सकै ना"। कोई नहीं समझ सकता। राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न ये चारों एक हैं, भगवान् हैं इसमें कोई महापुरुष नहीं है। सदा से अनादिकाल से हैं। चतुर्व्यूह कहलाते हैं ये। लेकिन जगह-जगह कैसी एक्टिंग हो रही है ? श्रीकृष्ण बलराम दोनों एक हैं और श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा को जब मोह हुआ और सब गाय, बछड़े, ग्वाल बाल सब हर ले गया, चुरा ले गया योगमाया से और भगवान् ने नया बना दिया। साल भर चलता रहा वो और बलराम को नहीं पता चला। तो बलराम ने देखा कि ये बड़ी-बड़ी अजीब-अजीब बातें हो रही हैं ! ये ग्वाल बाल ये आजकल ऐसा-ऐसा प्यार अपनी माँ से, भाई से, बहन से सब से कर रहे हैं। ये तो ऐसा कभी नहीं हुआ ये बात क्या है? मेरा तो दिमाग खराब है। क्या हो रहा है? कहीं कोई राक्षस की लीला तो नहीं हो रही है हमारे ऊपर। तब भगवान् से पूछा। तब भगवान् ने कहा- हाँ हाँ, वह मैं ही बना हूँ सब गाय, ग्वाल बाल, बछड़े सब मैं ही बन गया हूँ। एक्टिंग करते हैं सब इसी प्रकार की।

हनुमान जी राम को नहीं पहचान रहे हैं। जो हृदय फाड़कर के सीताराम को दिखा सकते हैं और जिनके रोम-रोम से सदा राम-राम निकलता रहता है, वह अपने इष्टदेव ही को नहीं पहचाने। "की तुम तीन देव मँह कोई।" की तुम, की तुम, की तुम....। ये की तुम, की तुम क्या लगा रखा है? और राम भी वैसी ही एक्टिंग करते हैं- अरे! तुम कौन हो भाई! हाँ, अपना परिचय तो बताओ। तो हनुमान जी कहते हैं- "मोर न्याउ मैं पूछा साईं।" मैं मायाबद्ध हूँ। अच्छा ! ये भगवान् के पार्षद हैं सदा से और अपने को बता रहे हैं मायाबद्ध हैं-

मोर न्याउ मैं पूछा साईं। तुम कस पूछिय नर की नाईं।

तुम बन्दर की तरह हो वह नर की तरह है दोनों एक्टिंग कर रहे हैं। राम लक्ष्मण के लिए रो रहे हैं बैठ के, पहाड़ उठा के ला रहे हैं हनुमान जी। सब नाटक है। नाटक में सब तरह की बातें होती हैं। वहाँ बुद्धि का काम नहीं। बस लीला सुनकर के विभोर हो जाओ। सोचने विचारने की, अकल लगाने का काम नहीं है।
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।। 

दीनता विनम्रता सहिष्णुता केवल गुरू तथा ईष्ट एवं उनके वास्तविक अनुयायियों के सामने , वास्तविक भगवद् भक्तों के सामने दिखाना चाहिए ।। तुलसीदास जी कि कहानी से स्पष्ट है ।

दीनता विनम्रता सहिष्णुता केवल गुरू तथा ईष्ट एवं उनके वास्तविक अनुयायियों के सामने , वास्तविक भगवद् भक्तों के सामने दिखाना चाहिए ।। वांकी विधर्मियों के सामने , राष्ट्र तथा धर्म द्रोहियों के सामने हाथों में तलवार और मुख में ललकार आवश्यक है , नहीं तो ये लोग इन गुणों का मूल्य नहीं समझेगा और कायर मान के और भी दबाने का कोशिश करेगा । 

तुलसीदास जी को जब मुग़ल शासक के कुछ सैनिक पकड़ कर मुगल दरबार में हाजिर किया तो वो मुगल शासक के सामने नहीं झुके वल्कि डट कर खड़े रहे । 

मुगल शासक ने कहा तुम मेरे सामने सिर नहीं झुकाओगे तो मैं तेरा सर धर से अलग कर दूंगा कोई बचाने नहीं आएगा । देखता हुं तुम्हारा राम तुमको बचाने कैसे आता है यहां ! 
तुलसीदास जी ने कहा मेरे इष्ट को यहां आने कि कोई जरूरत नहीं है । इसके लिए मेरे गुरू हनुमान जी को भी यहां आने कि जरूरत नहीं है । मुझे बचाने के लिए मेरे गुरू हनुमान जी के सेवक ही काफी है ।
इतना कहते हीं पुरे शहर को वानरों ने घेर लिया , यहां तक कि राजमहल के कोने कोने में फ़ैल गया बानर सेना ! हजारों मुगल सैनिकों को जख्मी कर दिया , सब तबाह कर डाला । अंत में मुगल शासक तुलसीदास जी के सामने घुटनों के बल बैठकर उनके शरण में आकर माफी मांगी । 
तो यह है भक्ति की शक्ति और गुरू शरणागति का फल । एक वास्तविक गुरू भक्त अपने गुरू तथा ईष्ट एवं उनके भक्तों के सामने ही झुकता है और किसी के सामने नहीं । जय जय जय श्री राधे ।

कुछ बनाना ही हो तो मुझे विभिषण बना देना जो अधर्म के साथ युद्ध में अगर मेरा भाई और समाज भी विधर्मी हो तो मैं उसे त्याग कर आपके पक्ष में खड़ा रहुं ।

हे महाप्रभु मुझे कभी भी भीष्म, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य तथा कर्ण बनने कि शिक्षा और प्रेरणा नहीं देना ,जो आपका भक्त होते हुए भी या तो विधर्मियों के साथ खड़ा था या तो मुक दर्शक था !
 कुछ बनाना ही हो तो मुझे विभिषण बना देना जो अधर्म के साथ युद्ध में अगर मेरा भाई और समाज भी विधर्मी हो तो मैं उसे त्याग कर आपके पक्ष में खड़ा रहुं ।
अगर विभिषण भी नहीं बनाने कि इच्छा हो तो मुझे बानर , भालु या रीछ बना देना जो मैं आपके निमित्त ही आपके पक्ष में अधर्म से युद्ध लड़ूं और आपके प्रति मैं अपना छोटा ही सही पर योगदान दे सकूँ ! 
हे प्रभु अगर ये सब भी नहीं बनाना है तो जटायु कि तरह एक पक्षी बना देना जो अपनी मां सीता के निमित्त अधर्मी से युद्ध करके आपके निमित्त शहीद हो जाऊं । 
हे महाप्रभु अगर इसके भी योग्य मुझे ना समझो तो मुझे वो गिलहरी बना देना जो आपके निमित्त राम सेतु बन्धन में दो छोटा पत्थर डाल के आपके प्रति अपना फर्ज और उत्तरदायित्व पुरा करके अपने जीवन को सार्थक कर सकूं ।

हे महाप्रभु कृपालु जू सरकार मुझे स्वार्थी भक्त कभी नहीं बनाना , मुझे ऐसा भक्त बनने का वरदान कभी मत देना जो अपने सुख और आनंद के निम्मित आपकी भक्ति करें ! 
मुझे तो ऐसा भक्त बनने का वर दो जिससे मेरा जीवन आपके काम आ सके । मेरे खून का कतरा कतरा आप पर बलि बलि जाए । मेरे खून का कतरा कतरा आप पर निक्षावर हो सके । आपके हर अवतार में आपके तथा आपके सनातन धर्म तथा सिद्धांतों के निम्मित सेवा करते करते अपना प्राण , तन मन धन निक्षावर कर सकूं । मैं मरूं तो सिर्फ आपके निम्मित और जिऊं तो सिर्फ आपके सेवा के खातिर तथा आपके सनातन वैदिक धर्म के उत्थान में योगदान के खातिर । आपकी कृपा से मुझे बोध हो गया है कि आपके सकाम सेवा में सुख नहीं , वल्कि आपकी निष्काम सेवा ही धर्म है, सुख और आनंद है । 
"गुरू सेवा हीं धर्म हमारो , दास न हम श्रूतिचारि के । 
ठाकुर युगल किशोर हमारो , चाकर हम पिय प्यारी के "।। 
जय जय सियाराम । :- आपका कृपा आकांक्षी आपका पुत्र संजीव कुमार ।

पुरे विश्व में सबसे दुखी भारत के हीं लोग हैं , और सबसे सुखी कुछ गिने चुने लोग भारत में ही हैं , जानते हैं क्यों ?

पुरे विश्व में सबसे दुखी भारत के हीं लोग हैं , और सबसे सुखी कुछ गिने चुने लोग भारत में ही हैं , जानते हैं क्यों ? 
क्योंकि हमारे भारत के अधिकांशत: हमारे हिन्दू भाई बहन लोग हिन्दू संस्कृति, सनातन धर्म, सांस्कृतिक विरासत के प्रति उदासीन है , लापरवाह है , या विरोधी है , यहां तक कि अपने हीं हिन्दू देवी देवता तथा संतों , महापुरुषों के अपमान करने , अपमान सुनने , सुनकर शांत बैठने में पुरे विश्व में अग्रगणी है । 
हिन्दू का सबसे बड़ा दुश्मन स्वयं हिन्दू हीं है । अत: इन अपराधों के परिणामस्वरूप फल के रूप से दैविक शक्तियों के द्वारा दिए गए परिणामों से तीनों रूपों से पिड़ित हैं और रहेंगे । 
आध्यात्मिक ताप , भौतिक ताप तथा दैविक तापों से ग्रस्त हैं और रहेंगे ।
हमारे हिन्दू बाहुल्य देश में जितना आक्रमण विदेशी आक्रांताओं का हुआ उतना किसी देश में नहीं हुआ । 
विदेशी आक्रांताओं ने हमारे भारत में आकर हमें लूटा , हमारे बहु बेटियों के अस्मिता को लुटा , हमारे तीर्थों और मंदिरों को लुटा , ध्वस्त किया , उस पर मस्जिदें बनवाई , और हमारे तथाकथित क्षूद्र प्रकृति के गद्दार हिन्दू भाई या तो हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे या उनसे जाकर दोस्ती कर ली , उनसे संबंध स्थापित किया , उन आक्रांताओं को यहां बसने में , राज करने में मदद की । और आज भी विधर्मियों को राज करने में मदद कर रहे हैं । अत: गद्दार हिन्दू ही इन सबके लिए सबसे पहले दोषी है ।

आज भी कुछ राज्य इसका उदाहरण है जहां विधर्मियों ने खुलेआम हमारे सनातन वैदिक धर्म को , सांस्कृतिक विरासत तथा रीति-रिवाजों पर तीखा प्रहार करते हैं और वहां अधिसंख्य क्षूद्र स्वभाव के , दुष्ट स्वभाव के गद्दार हिन्दू ताली बजाते हैं , उनको अपना बहुमूल्य वोट देकर ताकत देते हैं । यही हमारे देश का दुर्भाग्य है । 

अगर अब भी नहीं चेतोगे तो एक एक के घर घुस कर वो लोग तुम्हारे बहु बेटियों को लुटेंगे और तुम ताली बजाओगे , यह दिन फिर दुर नहीं है । 

बड़े आश्चर्य कि बात है हमारे देश में नास्तिकों की फौज है और वो भी हिन्दूओं कि , आज विदेश में अधिक संख्या में विदेशी लोग सनातन वैदिक धर्म की ओर तेजी से रूख कर रहे हैं लेकिन हमारे देश के अधिसंख्यक हिन्दू गर्त की ओर बढ़ रहे हैं । 

इन सबका विनाश नियती ने तय कर रखा है वो अवश्य होगा । यह एक ध्रुव सत्य है यह नोट कर लिया जाए । 

कितने आश्चर्य की बात है कि कुछ स्वघोषित जगद्गुरु कालनेमी तथा मारिच के रूप में बहुरूपिए हमारे देश में वास्तविक संतों तथा महापुरुषों पर ऊंगली उठाते हैं और देश का हिन्दू समाज ताली बजाता है । 
यह पाप कहां जाएगा ? 
इतिहास गवाह है रावण का साम्राज्य , कंश का साम्राज्य, हिरण्यकश्यप तथा हिरण्याक्ष तथा उनके वंशज , जरासंध और शिशुपाल का साम्राज्य, कौरवों का साम्राज्य तथा उनके वंशज बुरी तरह समाप्त हो गए , महाकाल के ग्रास बन गए ऐसे ही अधर्म के कारण और अधर्मी को साथ देने के परिणाम स्वरूप । 
अग्नी शायनी द्रोपदी के चिर हरण के समय जो लोग मुक दर्शक बन कर दर्शक दीर्घा में बैठे रहे वो भी बुरी तरह मारे गए ।
फिर भी आज के अधिकांश हिन्दू यह सब देख कर अकर्मण्य बने हुए हैं मुक दर्शक बने हुए हैं , और अधिकांश तो विधर्मियों के साथ है । इन सबकी क्या दशा होने वाली है भविष्य में वो इतिहास में ही निहित है । 

मुझे तो दिखाई दे रहा है । 
एक बार फिर महाभारत से भी बड़ा विनाशकारी युद्ध , प्राकृतिक आपदा , विध्वंशक घटना बहुत जल्द घटने वाली है इसी सदी में । जिसमें बड़ी संख्या में महाविनाश होने वाला है । 
अभी तो छोटी मोटी घटना घटी है कोरोना का केवल , टेलर था , जब एक अदृश्य वायरस ने कितने परिवारों को लील गया जो एक संकेत मात्र है कि अभी भी वक्त है सुधर जाओं नहीं तो मानव शरीर बुरी तरह से छीन लिया जाएगा और फिर नहीं मिलेगा दुबारा । 
फिर कल्पो तक निकृष्ट शरीर में पड़े रहोगे । 
ए आपका विरोधी स्वाभाव , गंदी सोंच, कलुषित विचार, घटिया कर्म ले डूबेगा तुम्हें । 
प्रकृति और भगवान से अधिक ताकतवर तुम नहीं हो । अपनी दो अंगुलियों कि खोपड़ी से जो सोंच रहे हो वो सत्य नहीं है । कुतर्क वितर्क अतितर्क सबका फल अवश्य मिलेगा । 
अभी तो गदही और गद्हा के जवानी के जोश की तरह नशे में हो , जब इसका परिणाम भुगतना होगा तब पता चलेगा , जब सनातन वैदिक धर्म , हिन्दू देवी देवता और वास्तविक संतों का अपमान कर रहे थे , या होता देख कर ताली बजा रहे थे या भीष्म, द्रोणाचार्य, धृतराष्ट्र तथा गंधारी की तरह बहरे और गुंगे बने हूए थे तब क्यों नहीं सोंचा ! 

मैं तो जब भी इस तरह के अपमान की घटना देखता हुं तब तब अपने ईष्ट और गुरू के सामने रोता हुं , फरियाद करता हुं अपार कष्ट और दुख के साथ कि हे प्रभो अब जल्दी करो । आज करोड़ों दुर्योधन है हमारे समाज में, हमारे देश में , तुमने तो एक दुर्योधन के पाप से त्रस्त अपने जनों के रक्षा के लिए महाभारत जैसा युद्ध होने दिया और स्वयं धर्म के साथ खड़े रहे । 
आज तो अधिकांश हिन्दू दुर्योधन बन कर अपने ही संतों और महापुरुषों का , अपने ही धर्मों का केवल अपमान ही नहीं कर रहे हैं वल्कि उनका साथ दे रहे हैं । तो 
भगवान मुझे संकेत देते हैं कि मत रो , ऐसे लोग स्वयं अपने विनाश को बुला रहे हैं जो अवश्य संभावित है मेरे पुत्र । एक बार फिर सबसे पहले भीष्म , द्रोणाचार्य और कृपाचार्य , कर्ण जैसे लोगों का विनाश सबसे पहले होने वाला है , दुर्योधन से पहले , क्योंकि ये तत्वज्ञानी तथा भगवान का भक्त होने के बाबजूद विधर्मी दुर्योधन के साथ खरा है एक बार फिर ।
 
भगवान के इसी सांत्वना के बल पर मै आश्वस्त हुं कि सभी विधर्मी अबकी बार फिर महाकाल का ग्रास बनने बाले है और यह भारत कि बसुंधरा पाप तथा पापियों के बोझ से उत्तीर्ण होने वाली है एक बार फिर । 
जय जय सियाराम , जय महाकाल , महाकालो के काल , जय महाकाली अपने देव भूमि भारत की रक्षा करो । 
जय जय श्री राधे ।
:- संजीव कुमार।

Friday, 2 February 2024

ग्रह नक्षत्र , ज्योतिष विज्ञान के बारे में थोड़ा गाईड लाईन जो आपको डर से बाहर निकलने में मदद करेगा ।

ग्रह नक्षत्र , ज्योतिष विज्ञान के बारे में थोड़ा गाईड लाईन जो आपको डर से बाहर निकलने में मदद करेगा ।

 वास्तविक संत क्यों कहते हैं मत उलझो इसमें । यह सब इस पोस्ट से क्लियर हो जाएगा , अगर ध्यान से पढ़ें तो। 

तो सबसे पहले समझिए जब हम यात्रा करते हैं तो रस्ते में माइल स्टोन देखा होगा आपने । 
वो हमें दुरियां बताता है कितना चल चुके और आगे किधर चलना है , जगह भी बताता है उस जगह का प्रभाव , प्रकृति , वहां का सब परिस्थितियां , वातावरण ।

 यह माईल स्टोन को ग्रह, नक्षत्र, दशा , अंतर दशा , प्रत्यंतर दशा , सूक्ष्म दशा के और इनके बीच की दुरी समय का अंतराल मान लिजिय ।

अब आप कन्याकुमारी से चले , यानि जहां आपका हमारा जन्म हुआ , उस समय वहां के माईल स्टोन से चलना प्रारंभ किये ।
( कन्याकुमारी एक उदाहरण है , कोई मदुरई में जन्म लिया तो वहां का माईल स्टोन यात्रा के आरंभ का कुंडली बन गया , जो चे़न्नई में जन्म लिया वहा का माईल स्टोन अलग हैं । 
और उसी माईल स्टोन को ग्रह नक्षत्र दशा महादशा आदि मान लिजिए । 
अब जन्म लिय हम , उस समय जिस माईल स्टोन के बीच थे वो हमारा कुंडली बन गया । 
और हां जन्म तो मिला पिछले संचित कर्मों के अनुसार , हमारे प्रारब्ध के अनुसार , ऊंच घर में गरीब घर में समृद्ध घर में लाखो प्रकार के घर स्थान और समय में ‌ 
ठीक जन्म के समय की स्थिति में ग्रह यानि माईल स्टोन कुंडली बन गया ।‌
अब हमें अपने पिछले कर्मो का फल मिलना शुरू हो गया जन्म लेते हीं। कोई जन्म के समय मर गया , कोई इंटेलिजेंट और स्वस्थ पैदा हुआ । कोई विकलांग तमाम प्रकार के । 
अब बच्चा है वो कर्म नहीं कर सकता उसको होश नहीं । तो पहले वो भोगता है अच्छा या बुरा जो भी अपने प्रारब्ध से । पर जीवन यात्रा शुरू हो चुकी जन्म के साथ हीं जीरो माइल से , समय के चक्र शुरू महादशा अंतर दशा गोचर शुरू ।‌ 
कुछ दिन में होश हुआ , मन सोचना शुरू किया , ज्ञान हुआ , अब भोग के साथ कर्म शुरू , माईल स्टोन, यात्रा के साथ बदल रहा है । उसे हीं महादशा ,अंतर दशा, प्रत्यंतर दशा , सूक्षम दशा समय का पहिया गोचर है सब सांकेतिक है पर है माईल स्टोन और पहिया , उस पहीये में हव है स्पोक है और उसका गणना है , गति है । 
तो वो माईल स्टोन हमारे पिछले कर्मों के फल का आइडिया देता है , ना कि हम कर्म क्या कर रहे हैं वो और आगे क्या करने वाला हैं वो , कर्म की स्वतंत्रता हमें मिला है । कर्म करने का प्लान बनाने , सोचने और करने में मनुष्य स्वतंत्र है । इसलिए आगे कर्मो का यानि क्रियामान और आगे का हमारे द्वारा किया जाने वाला कर्म , हमारे पिछे के अच्छे और बुरे फल में बृद्धि यह कमी लाने बाला है उत्पेरक है । अच्छा करेंगे तो बुरे फल कि तीव्रता कम होगी । और यदि बुरा किया तो बुरे फल कि तीव्रता और बढ़ेगी । 
हम आगे क्या करेंगे या अभी क्या करेंगे वो भगवान भी नहीं बता सकते हैं न जानते हैं । ज्योतिष की तो बात ही छोड़िए ।

ज्योतिष से बस इतना पता चलता है कि हम क्या कैसा फल भोगे पिछले सभी माईल स्टोन के बीच जहां से चले थे इस जीवन यात्रा में और आगे क्या भोगेंगे पिछले कर्मों के फल के रूप में वो केवल पता चलता हैं वो भी आज के किये कर्म के हिसाब तक ।

बस इतना हीं इससे अधिक कुछ भी नहीं । 
और एक सबसे बड़ी खास बात कि मान लिजिए पिछले कर्मों के अनुसार हमको जेल जाना लिखा है , ग्रह दशा , गोचर , अंतर दशा सब बता रहा है । पर हम जान गए सही सही जानकार ज्योतिष से की हमारा बुरा समय चल रहा है या अच्छा चल रहा है और बुरा आने वाला है , हम जेल जाने वाले हैं घोटाला किये है पहले , चोरी किया है सताया है किसी को । उसके फल के रूप में हमको खडाब फल पर मिलने का योग है भविष्य में इतने से इतने माईल स्टोन के बिच आगे कि यात्रा में , और मान लिजिए हमको जेल जाने का तीव्र योग है और ज्योतिष बता रहा है तो हम अगर सजा से बचना चाहते हैं या सजा कम मिले तो हमको करना क्या चाहिए ।

तो वो अगर सही ज्योतिष है तो कहेगा जाके सरकार के सामने सरेंडर हो जाइए । 
आगे आगे अभी जाकर इनकम टैक्स के सामने सरेंडर कर दें । और बोलिए मालिक गलती हो गई , हमने गुणाह किया है , कानून का पालन नहीं किया वो ये लिजिए चुराया धन , और माफ कर दिजिए हमको । 
तो यह कर्म किया । कर्म योनि है ना तो अच्छा कर्म कर लिया तुरंत , तुरंत सरेंडर कर दिया , अब सरकार थोड़ा बहुत सजा दे के फाइन करके माफ कर दिया । 
फल भोगना था, जेल का हवा खाना था आगे भविष्य में , ग्रह दशा सब बता रहा था । पर सचेत हो गये हम । और अच्छा उपाय किया , अच्छा ज्योतिष बता दिया कि ये फल मिलने वाला है , जाकर सरेंडर कर दो तुरंत । आप सरेंडर कर दिए , थोड़ा फाइन उन हुआ और आप बच गए । 
तो यह फायदा हुआ ज्योतिष ज्ञान से । 

लेकिन आज बहुत सारे ज्योतिष करते क्या हैं? तो बता देंगे की आपको जेल मिलने का योग है । पर उपाय के नाम पर कहेंगे आप रूद्राक्ष पहन लो , हीरा पहन लो , मोती पहन लो निलम पहन लो। हमसे प्राण प्रतिष्ठित यह चीज ले लो । और एक बड़ा रकम हमको दे दे दो । यानि एक तो आपने गलत काम किया । उसको वो जान कर अब आपको लुट रहा है , वो आपसे भी भारी चोर है , आप चोरी किये हैं , वो जान गया , वो नंबरी गुंडा उपर से 😀😀 , उसको ज्ञान है ज्योतिष शास्त्र का , लेकिन वो क्या कर रहा है तो वो आपका सरदार बन गया अब । ऐ तुमको हम बचा देंगें , ग्रह को घुमा देगें😂😀😀 
ये जाप करो , ये पुजा , हवन करो , ये पत्थर पहनो , यह करो, वह करो , इतना खर्च करो । यानि चोर चोर मौसेरा भाई ‌ आपका भाई बन गया आपका सीक्रेट्स जान गया । 
अब आपको डरा रहा है फिर जो धन आप लुटे गलत काम कर चुके है वो आपसे हिस्सेदारी मांग लिया ।
और जब वो समय आया तो आप गय जेल क्योंकि एक तो पाप किया आप पहले , उपर से उसको और छुपाया , और भी भारी पाप किया , डबल ।
आप हतप्रभ । कुछ काम नहीं आया । अरे आएगा कैसे । एक तो पाप कर चुके हैं और दुसरा पापी आके आपको सही सलाह न देकर आपको और छुपाने का पाप करा दिया ।

 सही ज्योतिष होता तो कहता भाई देख तुमने गलत काम किया है कोई उपाय काम नहीं देगा । तुमको भविष्य में या अभी यह सजा मिली है ।
तुम्हरा किया गया पाप हीं शनी बन गया है और वो भी नीच का शनी, खडाब शनी , वक्री । अच्छा किये रहते तुम अगर, तो शनी यानि फल शुभदायक होता तुम्हारे लिए , सब तरह का अच्छा शनी रूपी फल मिलता तुमको । पर किया गलत इसलिए तुम्हारे उपर क्रूर शनी जो तुम्हारे कर्मो के फल के रूप में खड़ा है आने वाले समय में वो बड़ा खतरनाक है । भाई एक हीं रस्ता है जाके सरेंडर कर दें इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के सामने , सजा कम हो जाएगा । लेकिन चुंकि वो ज्योतिष गलत है इसलिए 
 वो लुट के चल दिया वो आगे मिलेगा उसको भी सजा । पर आप तो नहीं बचने बाले फिलहाल ।

इसलिए संत लोग कहते हैं कि छोड़ो ज्योतिष का चक्कर , तुम आज से अच्छा काम करो, वो न सताओ किसी को , न अपमान करो किसी का , किसी को दूख मत दो आज से , पड़ पीड़ा सम नहीं अधमाई । और भगवान का नाम लो आज से सही सही , और आज से शुभ कर्म करना शुरू कर दो । सब सजा कम हो जाऐगा आगे का अगर खडाब समय आने वाला होगा तो । 
और अगर अच्छा समय आगे आने वाला होगा तुम्हारा तो और भी अच्छा अच्छा हो के आएगा । 
और छोटी गरबरी किया है पहले तो उसका फल भी मिट भी सकता हैं । तो यह है थोड़ा आईडिया जो मैंने आपको दिया है , गहरी बात समझना संभव नही छोटे से पोस्ट में । यह वृहत बिषय हैं ।
हां एक बात समझ लिजिए एक अच्छा ज्योतिष आपको अच्छा बनने का सलाह देगा । शुभ कर्म का सलाह । 
और अपने आजिविका को चलाने के लिय वाजिब फीस लेगा केवल , क्योंकि वही उसकी आजिविका का साधन है वेचारे का । हर तरफ से नहीं लुटेगा आपको । 
 श्री राधे :- आपका संजीव ।

कुछ लोगों का स्वाभाविक जिज्ञासा है , तर्क है कि भगवान रस सिंधु हैं , आनंद है और वो सभी जीवों के अंदर बराबर विद्यमान है तो फिर सभी जीव बराबर मात्रा में आनंदमय क्यों नहीं है , सुखी क्यों नहीं है , दुखी क्यों है , ?

कुछ लोगों का स्वाभाविक जिज्ञासा है , तर्क है कि भगवान रस सिंधु हैं , आनंद है और वो सभी जीवों के अंदर बराबर विद्यमान है तो फिर सभी जीव बराबर मात्रा में आनंदमय क्यों नहीं है , सुखी क्यों नहीं है , दुखी क्यों है , ? 

अच्छी जिज्ञासा है । अच्छा तर्क है । 
सभी जीवों के अंदर रस सिंधु , आनंद सिंधु भगवान का निवास है और हमेशा रहता है , भगवान किसी भी जीव से एक पल के लिए भी दुर नहीं रहते , यह बातें महापुरुष सम्मत है शास्त्र सम्मत है , फिर भी सभी जीव आनंदमय नहीं है बराबर रूप से सुखी नहीं है । 

वो इसलिए कि सभी जीवों में से कितने जीवों को ठीक ठीक यह मालुम है कि भगवान हमारे अंदर विद्यमान है !
फिर उन जीवों में से कितने जीव ऐसे हैं जिनको यह विश्वास है कि भगवान हमारे अंदर हैं?  
फिर उनमें से कितने जीव ऐसे हैं जो सौ प्रतिसत यह मानते है दृढ़ता के साथ कि भगवान हमारे अंदर विद्यमान है ?

फिर उनमें से कितने जीव अपने अंदर के भगवान को खोजने के लिए , उनको प्राप्त करने के लिए प्रयास रत है , यानि साधना रत्त है । फिर उनमें से कितने जीव ऐसे हैं जो उनको प्राप्त करके महापुरूष बन गया है ? जिसने अपने अंदर के भगवान को साधन भक्ति करके प्राप्त कर लिया है , उनसे संबंध स्थापित कर लिया वो सुखी हो गया , वो आनंदमय हो गया है । 

जिसने जाना नहीं , जान कर विश्वास नहीं किया , विश्वास किया लेकिन दृढ़ता के साथ माना नहीं , मान लिया तो फिर उनको प्राप्त करने के लिए साधना नहीं की , उनसे संबंध स्थापित नहीं किया , उनको प्राप्त नहीं किया वो भला कैसे सुखी हो सकता है ? 

ए तो ऐसा ही है कि जीव के घर के अंदर गहराई में अकूत धन‌ दौलत खजाना छुपा हुआ है । लेकिन उसको पता नहीं है , वो दो कौड़ी के लिए संसार में मारे मारे फिर रहा है , दुख झेल रहा है । 
अब किसी महापुरुष ने बता दिया , ए तुम्हारे घर के अंदर अकूत धन दौलत छुपा है और तुम संसार में मारे मारे फिर रहे हो ?

अब हमलोगों में से कुछ लोग जान तो लिया कि हमारे घर के अंदर खजाना छुपा है जमीन के गहराई में , लेकिन हम विश्वास नहीं किए महापुरुषों के बातों पर , शास्त्रों के बातों पर ! कुछ विश्वास कर लिया लेकिन विश्वास पक्का नहीं है । 
इसलिए वो मानता नहीं ठीक ठीक । 

हमने मान भी लिया तो फिर उस खजाने को हासिल करने के लिए प्रयास नहीं कर रहे हैं , जमीन के अंदर खुदाई नहीं कर रहे हैं , तो फिर जानते हुए , या मानते हुए भी कि हमारे घर के अंदर अकूत धन दौलत गड़ा हुआ परा है हम उस धन से वंचित हैं तो भला हमें उस खजाने से क्या लाभ होगा । 
लाभ तो तब होगा जब उस खजाने को पाने लिए जमीन के अंदर खुदाई करेंगे और उनको प्राप्त करेंगे !

उसी प्रकार हमारे ह्रदय के अंदर आनंद सिंधु भगवान बैठे हैं लेकिन हम उनका लाभ नहीं ले रहे हैं । 
किसी महापुरुष द्वारा जान भी गए तो विश्वास नहीं है , मानते नहीं है , रियलाईज नहीं करते ।‌ केवल उपर ही उपर जय हो जय हो करते रहते हैं , उससे क्या होगा ? कुछ नही । 
अगर रियलाइज ठीक ठीक करते तो फिर उनको पाने के लिए गुरू निर्देशित साधना करते इमानदारी से ! 
अगर हममें से कुछ साधना कर भी रहे हैं तो गति बहुत धीमी है, ढुलमुल रवैया है । 

जिसने पा लिया उनको , वो महापुरुष बन गया , सुखी हो गया , और हम जानने के बाद भी लापरवाह है । 
यही कारण है कि हम सबके अंदर आनंद सिंधु भगवान के होते हुए भी हम दुखी हैं , संसार में सुख ढूंढ़ रहे हैं, दो कौड़ी के लिए भागे भागे फिर रहे हैं , जबकि रस सिंधु, अकूत धन दौलत हममें से प्रत्येक के अंदर है । सीधी सी बात है । 
:- श्री महाराज जी से प्राप्त ज्ञान से । 
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