Saturday, 30 September 2023

मो सम कौन कुटिल खल कामी।जेहिं तनु दियौ ताहिं बिसरायौ, ऐसौ नोनहरामी॥

हममें से जिनको जिनको ये अहंकार है कि हमसे बड़ा साधक या भक्त नही कोई , हमसे बढ़िया व्यक्ति कोई नहीं , उन्हें इस तत्वज्ञान को जरूर एक बार पढ़ना चाहिए:- 
बड़े बड़े महापुरूष, भगवद् प्राप्त संत स्वयं को पतित खल कामी मानते हैं । 
लेकिन हम साधारण मनुष्य जिसका ह्रदय गंदा है, अंत:करण गंदा है, बुद्धि भ्रमित है, स्वयं का अभी ठिकाना नहीं कि हम अगले जन्म में कुत्ता बिल्ली गद्हा घोड़ा बनेंगे या मनुष्य शरीर ही मिलेगा ! लेकिन घोर आश्चर्य कि बात की तमाम तत्वज्ञान सुनने, जानने और समझने के बाबजूद हम स्वयं को बहुत बड़ा विद्वान, बुद्धिमान और सबसे ऊंचा तथा अच्छा मानते हैं, और दुसरे को छोटा समझते हैं , दुसरे को अधम , पतित नीच तथा गंदा समझते हैं, यही पहचान है कि हमारा अंत:करण कितना गन्दा है, कितना हमने कमाया है और कितना गंवाया है आज तक । फिर भला हमारे जैसे सोंच बाले जीव का कल्याण कैसे हो सकता है ? 
स्वयं को बड़ा समझना और वांकि संसार के लोगों को झूठा समझना , नीच समझना यह सिद्ध करता है कि हमारा मन कितना गन्दा है , अंतःकरण कितना गन्दा है ? यह सबसे बड़ा पहचान है स्वयं के नीच होने का । 

भगवद् प्राप्त महापुरुष तुलसीदास , मीरा , तुकाराम सुरदास आदि स्वयं को सबसे छोटा मानते हैं , अधम तथा पतित कहते हैं खूद को :- 

मो सम कौन कुटिल खल कामी।
जेहिं तनु दियौ ताहिं बिसरायौ, ऐसौ नोनहरामी॥
भरि भरि उदर विषय कों धावौं, जैसे सूकर ग्रामी।
हरिजन छांड़ि हरी-विमुखन की निसदिन करत गुलामी॥
पापी कौन बड़ो है मोतें, सब पतितन में नामी।
सूर, पतित कों ठौर कहां है, सुनिए श्रीपति स्वामी॥ :- सुरदास

भक्ति कि महारानी, भक्ति महादेवी की प्रति मूर्ति सबरी कहती हैं राम से :- 
"अधम ते अधम अधम अति नारी। 
तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी॥" 
सबरी कहती हैं "हे राम, भला मुझसे अधिक अधम मतिमंद कौन है इस जग में " ? 

 दास भाव भक्ति में श्रेष्ठ श्री हनुमानजी ने विभीषण से कहा -
कहहु कवन मैं परम कुलीना।
कपि चंचल सबही विधि हीना।।

यानी, कहो विभिषण जी, मैं कौन सा परम कुलीन हूं, मैं तो बंदर हूं, चंचल हूं और सब प्रकार से हीन हूं !

अस मैं अधम सखा सुनूं, मोहूं पर रघुबीर।
कीन्हीं कृपा सुमिर गुन, भरे विलोचन नीर।।

हे सखा सुनो, मैं ऐसा अधम हूं फिर भी रघुबीर ने मुझपर कृपा की है। इस प्रकार भगवान राम के गुणों का वर्णन करके हनुमानजी की आंखें डबडबा जाती हैं।

अरे भक्तों में श्रेष्ठ , भगवान शंकर श्री राम से प्रार्थना करते हैं और स्वयं को दीन स्वीकार करते हुए कहते हैं :- 

गुण सील कृपा परमायतनं। प्रणमामि निरंतर श्रीरमनं॥
रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीन जनं॥
जय राम रमा रमनं समनं। भव ताप भयाकुल पाहि जनम॥
अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो॥ :- भगवान शंकर । 

भावार्थ:- 
हे राम आप गुण, शील और कृपा के पराकाष्ठा हैं। आप लक्ष्मीपति हैं, मैं आपको निरंतर प्रणाम करता हूँ। हे रघुनन्दन! (आप जन्म-मरण, सुख-दुःख, राग-द्वेषादि) द्वंद्व समूहों का नाश कीजिए। हे जीवों का पालन करने वाले राजन, मुझ दीन जन की ओर भी दृष्टि डालिए॥10॥ :- भगवान शंकर ।

भक्तों में श्रेष्ठ श्री भरत कह रहे हैं :- 

मोहि समान को पाप निवासू। 
जेहि लगि सीय राम बनबासू॥
रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा।
 बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा॥2॥

भावार्थ:-भरत कह रहे हैं कि मेरे समान पापों का घर कौन होगा, जिसके कारण सीताजी और श्री रामजी का वनवास हुआ? राजा ने श्री रामजी को वन दिया और उनके बिछुड़ते ही स्वयं स्वर्ग को गमन किया॥2॥

फिर भरत जी कह रहे हैं :- 
मैं सठु सब अनरथ कर हेतू। 
बैठ बात सब सुनउँ सचेतू॥
बिन रघुबीर बिलोकि अबासू। 
रहे प्रान सहि जग उपहासू॥3॥
भावार्थ:-और मैं दुष्ट, जो अनर्थों का कारण हूँ, होश-हवास में बैठा सब बातें सुन रहा हूँ। श्री रघुनाथजी से रहित घर को देखकर और जगत् का उपहास सहकर भी ये प्राण बने हुए हैं॥3॥

गौरांग महाप्रभु जी ने स्वयं को दीन हीन पतित कहा :- 
एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि दुर्दैवमीदृशमिहाजनि नानुरागः॥२॥ - शिक्षाष्टकम्।

 गौरांग महाप्रभु कहते हैं कि हे प्रभु आपने अपनी कृपा के कारण हमें भगवन्नाम के द्वारा अत्यंत ही सरलता से भगवत-प्राप्ति कर लेने में समर्थ बना दिया है, किन्तु मैं इतना दुर्भाग्यशाली हूँ कि आपके नाम में अब भी मेरा अनुराग उत्पन्न नहीं हो पाया है ॥२॥

तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः ॥३॥ :- शिक्षाष्टकम्

हमारे गुरूदेव श्री कृपालु महाप्रभु जी ने अपने पदों में अनेकों जगह स्वयं के लिए " कृपालुमतिमंद " जैसे शब्दों का प्रयोग किया है । 

कबीरदास जी ने कहा है :- 
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय ।
जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय ॥ 

लेकिन हम है कि हमें दुसरे में दोष हीं दोष नजर आता है । यही सबसे बड़ा अहंकार है । 
जिसका मन बुद्धि चित्त अहंकार जितना गंदा होता है उसको दुसरे में उतना ही दोष नजर आता है । वो स्वयं को सबसे अच्छा और दुसरे को बुरा समझता है , इससे बड़ी मुर्खता कुछ भी नहीं । 
ऐसा जीव कभी भगवद‌् मार्ग का अधिकारी नहीं हो सकता । चाहे कितना भी सिर पटक ले महापुरुषों के चरण में । 

भगवद् मार्ग पर चलने वाले पथिक के लिए सबसे पहली कक्षा का पहला Lession है कि स्वयं को भगवद् प्राप्ति के पहले तक सबसे बड़ा गुणहगार , सबविधि दोषी, सबसे छोटा , अधमों में सबसे बड़ा अधम , अति पतित , अति दीन तथा भिखाड़ी समझना और दुसरे हरेक को अपने से उच्च मानना, चाहे कोई घोर संसारी हीं क्यों न हो ।
 
दुसरा Lession है स्वयं के लिए सम्मान न चाहे और हर किसी को सम्मान दे , दुसरे को अपने से ऊंचा माने वही भगवद् प्रेम मार्ग में सफल हो सकता है ।
 जिसको यह अभिमान है कि हम बड़े अच्छे हैं और दुनियां के वांकि लोग हमारे सामने कुछ भी नहीं वो सबसे बड़ा गद्हा है । बला का मुर्ख है वो । 
हमे भगवद् प्राप्ति के पहले सेकंड तक स्वयं को सबसे बड़ा पतित मानना चाहिए। नहीं तो गए , पतन निश्चित है ।
लेकिन हम है कि उल्टा सोंचते है , हम दुनिया को झूठा , मक्कार और फरेबी मानते हैं और स्वयं को महापुरुषों का दादा मानते हैं । यह हमारे अहंकार का पहचान है । यह सिद्ध करता है कि हमें कोई तत्वज्ञान नहीं । हमने गुरू से कुछ सिखा ही नहीं । कुछ भी ग्रहण नहीं किया । 
:- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी के प्रवचन से ।

Wednesday, 20 September 2023

संसार में क्या मां बाप अपने संतान से निस्वार्थ प्रेम नही करता ?

एक बार कुछ सत्संगी ने श्री महाराज जी से प्रश्न किया - महाराज जी इस संसार में क्या मां बाप अपने संतान से निस्वार्थ प्रेम नही करता ? 
श्री महाराज जी द्वारा उत्तर :- आज के युग में ऐसा बहुत कम उदाहरण है । न के बराबर ।
मैंने कई बार आप लोगों को बतलाया है कि प्रेम का कोई कारण न हो , फिर भी प्रेम हो , केवल उसे निष्काम प्रेम कहते हैं ? 
जिस प्रेम का एक भी कारण हो उसे प्रेम नहीं कहते, इसे स्वार्थ युक्त अटैचमेंट कहते हैं , स्वार्थ आधारित प्रेम कहते हैं । 

सतयुग , त्रेता , द्वापर आदि में संसारी माता पिता का ऐसा अनेको उदाहरण मिलता है शास्त्रों में जिसने अपने संतानों को पाला पोसा बड़ा किया और बिना किसी हिचक के उसे भगवान के निमित्त, गुरू सेवा के निमित्त स्वेक्षा से दे दिया । फिर उससे कोई संबंध नहीं, कोई अटैचमेंट नहीं, कोई लगाव नहीं । लेकिन प्रेम वश दे दिया , इसका परम कल्याण होगा । संतान से निस्वार्थ प्रेम है , उसके कल्याण कि चाह है , इसलिए दे दिया । खूद का कल्याण करेगा तत्पश्चात संसार के अन्य जीवों का भी कल्याण करेगा , इसलिए दे दिया , निज हित , निज स्वार्थ की कामना नहीं है । 

लेकिन कलयुग में ऐसा उदाहरण नहीं है । आज कुछ उदाहरण है भी तो वो वेमनी से ऐसा किया है । 

शंकराचार्य जब आठ वर्ष के थे तो अपनी मां से कहा कि मैं भगवान के निमित्त घर छोड़ना चाहता हूं , मुझे आज्ञा दे दो , मां ने आज्ञा नहीं दी, क्योंकि माता को पुत्र से स्वार्थ युक्त प्रेम था , स्वार्थ ए कि यह मेरे बुढ़ापे का सहारा बनेगा, विवाह करेगा , बच्चे पैदा करेगा , वंश वृद्धि करेगा आदि तमाम स्वार्थ जो आज आपलोगों को अपने संतान से है । 

जब बात नहीं बनी तो शंकराचार्य ने योगमाया के बल पर एक लीला किया , महापुरुष थे शंकराचार्य, महापुरुषों की लीला समझना कठिन है, तो शंकराचार्य ने मां के साथ नदी गए स्नान करने के लिए , उनके पैर को एक मगरमच्छ ने पकड़ लिया, अब उन्होंने काफी प्रयास किया उससे पैर को छुड़ाने की लेकिन मगरमच्छ उनको और भी गहरे पानी के तरफ खींचने लगा ( अरे यह सब तो लीला थी , भला किसकी हिम्मत है इस संसार में कि महापुरुष के बिना ईच्छा के उसे पकड़ ले और न छोड़ें ) , तमाम नाटक हुआ , शंकराचार्य ने अपनी मां आर्याम्बा ( शंकराचार्य कि मां का नाम है आर्याम्बा ) से कहा अगर मुझे संन्यासी बनने कि आज्ञा नहीं दोगी तो ए मगरमच्छ मुझे नहीं छोड़ेगा , मेरा जीवन लीला अभी समाप्त हो जाएगी । 
तब शंकराचार्य के मां आर्याम्बा को मजबूरी में आज्ञा देना परा । यहां भी शंकराचार्य कि मां ने एक शर्त रख दी , देखो तुमको मेरे अंत समय में मेरे पास आना पड़ेगा अंतिम संस्कार करना पड़ेगा । 
जब कोई वास्तविक सन्यासी बन जाता है तो तमाम संसारिक कर्म धर्म से मुक्त हो जाता है वो, तमाम संसारिक रिश्तो को त्याग कर कोई मनुष्य सन्यासी बनता है । लेकिन शंकराचार्य को अपने मां को बचन देना पड़ा, ठीक है ठीक है , मैं आऊंगा । 
तो आज इस कलयुग में तो एक भी माता पिता ऐसा नहीं जो स्वेक्षा से अपने सन्तान को हरि और गुरू के निम्मित कर दे । 
अगर कोई छोड़ता भी है तो वेमनी से। उसको तो खूश होना चाहिए कि उसकी संतान परम कल्याणकारी मार्ग पर जा रहा है, वो भगवान का संतान है , भगवान के निमित्त जा रहा है । 

अरे मनुष्य से ज्यादा निस्वार्थ प्रेम तो जानवरों को है अपने संतान से । इस मामले में जानवरों के माता पिता का स्थान मनुष्य से कहीं ऊंचा है । 
भगवान ने जानवरों को भी स्वाभाविक गुण दिया है , ममता का , दया आदि का । 
गाय भैंस बाघिन भालु बंदरिया , कुतिया बिल्ली आदि को आपलोग रोज देखते हैं । बच्चे को जन्म देते ही उसको चाट चाट कर गर्भ के मल को साफ करती है, सेवा करती है , उसकी रक्षा करती है , उसको दुध पिलाती है, पाल पोस कर योग्य बना देती है फिर उसे छोड़ देती है दुनियां में बिना किसी हिचक के , कोई अपेक्षा नहीं , कोई स्वार्थ नहीं , कोई अटैचमेंट नहीं । 
कोई कामना या कंप्लेन नहीं कि मैंने इसको जन्म दिया है, इसको अपना दुध पिलाया है , इसको पाला है , रक्षा कि है मैंने , अब ए बड़ा होकर मेरी रक्षा करें , मेरा ख्याल रखें , मेरी सेवा करें , अब यह मेरा स्वार्थ पुरा करें ! ऐसा कोई स्वार्थ जानवर माता पिता में नहीं है । इस दृष्टि से जानवर का अपने बच्चे से निस्वार्थ प्रेम कहा जाएगा । 

तो मनुष्य में तो ऐसा एक भी माता पिता नहीं मिलेगा संसार में जो निस्वार्थ प्रेम करें अपने संतान से और उसकी संतानें भी निस्वार्थ प्रेम करें अपने मां बाप से । 

मनुष्य में संसारिक प्रेम केवल स्वार्थ पर टीका होता है, संसार में जबतक एक दुसरे से स्वार्थ पुरा हो रहा है तथा भविष्य में भी पुरा होने कि संभावना है , उम्मीदें हैं , अपेक्षा है , आशा है तब तक प्रेम है , स्वार्थ खत्म प्रेम खत्म ।

 इस ब्रह्यांड में केवल महापुरूष और भगवान हीं जीव से निस्वार्थ प्रेम करता है और जीव से भी यही अपेक्षा करता है कि वो भी उनसे निस्वार्थ प्रेम करें । निष्काम प्रेम करें ।

भगवान ने बिना किसी स्वार्थ के बिना किसी भेद भाव के संसार के तमाम जीवों के लिए हवा , पानी , पृथ्वी , भोजन कि व्यवस्था कर दिया , जन्म लेने के लिए शरीर दिया, मां का गर्भ बनाया , उसके लिए मां के स्तन में दूध बना दिया समय पर इस प्रकार तमाम उपकार है हमारे उपर भगवान का, वो भी बिना किसी स्वार्थ के । 
उसी प्रकार एक शरणागत शिष्य के कल्याण के लिए बिना किसी स्वार्थ के गुरू क्या क्या भगीरथ प्रयास करता है वो तो भगवद् प्राप्ति के बाद हीं जीव को पता चलता है । 
आप क्या देते हैं गुरू को ? जो देते हैं वो सब मायिक वस्तूए है , उसकी कोई जरूरत नहीं, उपयोग नहीं किसी वास्तविक महापुरूष को , फिर भी वो आपसे इस हाथ लेकर उस हाथ से आपके हीं निम्मित खर्च कर देता है और आपके ही लाचार भाई बंन्धूओं के सेवा में लगा देता है ।
लेकिन महापुरूष आपको जो देता है उसका मुल्य तो कभी आप चुका हीं नहीं सकते । चाहे वो आप स्वर्ग सम्राट बन कर स्वर्ग का भी दान कर दो ! गुरू और भगवान के ऋण को कोई नहीं चुका सकता । 

श्री महाराज जी के एक प्रवचन श्रृंखला का सार, पुर्व सुने हुए मेमोरी के आधार पर । :- संजीव कुमार

ईश्वर इतना कठोर क्यों हैं ?

एक व्यक्ति का प्रश्न श्री महाराज जी से , महाराज जी ईश्वर इतना कठोर क्यों हैं ? 

श्री महाराज जी द्वारा उत्तर :- न न न यह सब ग़लत बातें हैं , भगवान कठोर नहीं होते हैं , उनसे बड़ा दयालु, उनसे बड़ा कृपालु तो कोई नहीं पुरे ब्रह्यांड में । भक्त के लिए तो भगवान का प्राण भी हाजिर है । जिसके आंखों में भगवान श्री कृष्ण के प्रति निष्काम प्रेम का आंसू हैं , जो स्वाभाविक रूप से नम्र है , विनम्र है , सहिष्णु है , जिसको अपने धन बल, शरीर बल, रूप बल , ज्ञान बल आदि का अहंकार नहीं , जो स्वयं को वास्तव में दीन मानता है और भगवान कि भक्ति करता है मन से , उसके लिए भगवान से बड़ा दयालु कृपालु तथा कोमल कोई नहीं , भक्त के लिए भगवान का ह्रदय तो एक क्षण में पिघल जाता है , भक्त के लिए वो अपनी भगवत्ता तक भूल जाते हैं , ऊखली में बंध जाते हैं , साटी से मार खाते हैं, घोड़ा तक बन गए ब्रज में , यह सब भगवान कि लीला आप लोग जानते हैं । भक्त के पीछे-पीछे डोलते हैं भगवान । 
निष्काम भक्त के प्रति वो स्वयं को ऋणि मानते हैं , भक्त के लिए वो अपने ही बनाए नियम कानून को त्याग देते हैं और भक्त कि रक्षा करते हैं , जो उसने मांगा भी नहीं वो भी उसे दे देते हैं मैटेरियल वस्तू भी और दिव्य सामान कुछ भी हो , भक्ति में इतनी शक्ति है , सब वो भक्त को देने के लिए आतुर रहते हैं , इसके लिए न वो भक्त का प्रारब्ध देखते हैं और न अगला पिछला कर्म धर्म । भक्त हमेशा सचेत होता है वो अपराध नहीं करता कभी।
जिसके आंखों में ईश्वर के प्रति निष्काम प्रेम का आंसू हैं भगवान उसके मुठ्ठी में है । 

हां भक्त को छोड़ कर वांकी जीवों के लिए भगवान कठोर हैं , जो घोर संसारी है , संसार में लिप्त है , अहंकार से युक्त है , स्वयं को देह मानता है , जिसको अपने ज्ञान , धन, वल , शरीर तथा सामर्थ्य का अहंकार है , उसके लिए भगवान न्यायी है , उसके लिए उनको कठोर बनना पड़ता है क्योंकि न्याय करना है उनको । 
भगवान को इस ब्रह्मांड के प्रत्येक जीवों ( मनुष्यों ) के मन में उठे प्रत्येक क्षण के प्रत्येक संकल्पों को नोट करने का कार्य करना पड़ता है तथा उन संकल्पों के अनुरूप किये गए कर्मों का फल देना पड़ता है , न्याय करना पड़ता है , इस काम को करने के लिए उनको कठोर बनना पड़ता है ,बिना कठोर बने न्याय नहीं हो सकता है , फल नहीं दिया जा सकता । 
संसार में एक मनुष्य ने दुसरे मनुष्य को मार दिया, तो जज को सजा सुनानी पड़ती है , अपराधी को कठोर सजा देनी पड़ती है , मृत्युदंड तक देना पड़ता है , यह काम इतना आसान नहीं होता , जज को न्याय करने के लिए , सजा सुनाने के लिए कठोर बनना पड़ता है । 
इसी प्रकार संसार में लिप्त घोर संसारी जीव को वक्त पर भगवान को भी दंड देना पड़ता है , उसके कर्मों के अनुसार फल देना होता है । 
अब जीव गलत कर्म करता है तो उसको दंड मिलता है , वो भाग भाग के मंदिरों में जाता है , तीर्थों में सिर पटकता है , लेकिन उसको फल के रूप में सजा भोगना पड़ता है, सबको भोगना पड़ता है , पुर्व जन्मो के किए कर्म तथा इस जन्म का उसका किया क्रियामान कर्म, पाप-पुण्य कर्म जब फलीभूत होता है तो वो माफ नहीं होता , चाहे कितना भी कोई संसारी मंदिर मस्जिद, गुरूद्वारा आदि जा कर सिर पटके, और सब करने पर भी जब उसे दंड मिलता है , फल भोगना पड़ता है तो वो समझता है कि भगवान कठोर हैं । 
अरे संसारिक कर्म धर्म के लिए हरेक देश में कायदा कानून हैं, कानून का उलंघन हुआ तो देश के कानून के हिसाब से सजा मिलती है ।
उसी प्रकार ब्रह्यांड के तमाम जीवों के लिए एक कानून हैं भगवान का, वहां से बचना मुश्किल है । नियम का उलंघन हुआ दंड मिलेगा, कोई नहीं बच सकता वहां से चाहे कोई कितना रोये गिड़गिड़ाए , गलत कर्म करते समय क्यों नहीं सोचा तुमने ? 
:- श्री महाराज जी के प्रवचन से ।

Monday, 18 September 2023

अपेक्षा , आसक्ति और वैराग्य

किसी व्यक्ति,वस्तु,या बिषय से आसक्ति ही उससे अपेक्षा को जन्म देती है, अपेक्षा पुरी होने पर उससे आसक्ति और भी बढ़ जाती है, आसक्ति और बढ़ने से अपेक्षाएं और भी बलबती होती है, और पुरी नहीं होने पर उस बिषय , व्यक्ति , वस्तु या सामान से दुख मिलता है, जब दुख मिलता है तो या तो क्रोध कि उत्पत्ति होती है या द्वेष बढ़ता है , और जब क्रोध या द्वेष से भी काम नहीं बनता तब अपेक्षाएं कम होती है , और जब बार बार अपेक्षाएं खंडित होती है तो उससे आसक्ति समाप्त हो जाती है, जीव उससे उदासीन हो जाता है ।

 इस प्रकार आसक्ति समाप्त होने पर उस बिषय , वस्तु , व्यक्ति तथा सामान से मोह समाप्त हो जाता है , इसी को वैराग्य कहते हैं या दुसरे शब्दों में संसार का छीन जाना कहते हैं । मोह पुरी तरह से समाप्त हो जाने पर ही वैराग्य कि उत्पत्ति होती है । अत: वैराग्य के लिए मन से उस बिषय , वस्तु , व्यक्ति तथा सामान से अपेक्षाओं का मिटना परमावश्यक है । 
भगवान और गुरू यही कार्य करते हैं । अपने शरणागत शिष्यों की आसक्ति को संसार से मिटाने के लिए अपेक्षित फल के विपरित फल देते हैं , यानि अनापेक्षित फल देते हैं, अर्थात उल्टा परिणाम देते हैं ताकि शरणागत शिष्य संसार से निराश होकर भगवान में मन लगाने का कार्य करें , यानि किसी भी बिषय वस्तु व्यक्ति तथा सामान से अपेक्षाएं समाप्त कर लें और केवल हरि और गुरू से मानसिक स्तर पर अटैच्ड हो जाए । 
संसार से सारी अपेक्षाएं मिटते ही वैराग्य उत्पन्न होता है और वैराग्य होते ही मन भगवान तथा गुरू में सेंट पर्सेंट लग जाता है , जीव को भगवद् दर्शन होता है , इसी को भगवद् प्राप्ति कहते है । 
जब तक मन के किसी एक भी कोने में किसी भी प्रकार के मायिक बिषय वस्तु व्यक्ति या सामान से सुख की अपेक्षाएं हैं, भगवद् प्राप्ति नहीं हो सकती । :- 
श्री महाराज जी का सिद्धांत पूज्यनीय रासेश्वरी देवी जी के शब्दों का सार ।

Saturday, 16 September 2023

अन्न और मन का सम्बन्ध

श्री महाराज जी कि दिव्य वाणी और निर्देश :- 
***********अन्न और मन का सम्बन्ध*************

चाहे जो भी हो ऋषि हो, मुनि हो, भक्त हो, नास्तिक हो, शरीर रखे हो, उसको देना पड़ेगा सब सामान। विटामिन ए. बी. सी. डी. सब। नहीं तो फिर बीमारी होगी और फिर बैठकर बीमारी का चिन्तन करोगे फिर भगवान् का चिन्तन नहीं होगा। वह जरूरी है। 'तनु बिनु भजन वेद नहिं बरना' शरीर के बिना भक्ति नहीं हो सकती। और वह शरीर के लिये सामान सही-सही होना चाहिये, यह भी शर्त है भगवान् की-

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
 युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ (गीता ६.१७)

वो कर्मयोगी हो, ज्ञानयोगी हो, भक्तियोगी हो तीनों के लिये ठीक-ठीक खाना, ठीक-ठीक व्यवहार, ठीक-ठीक सोना, ठीक-ठीक जागना। सबका नियम है। वैज्ञानिक भी और आध्यात्मिक भी। उसके अनुसार चलना होगा। अधिक सोये बीमारी हो जायेगी, कम सोये बीमारी हो जायेगी। अधिक खाया बीमारी हो जायेगी, कम खाया बीमारी हो जायेगी।

 नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्रतः। (गीता ६.१६)

 अधिक खा लेने वाला योगी नहीं हो सकता।
न चैकान्तमनश्रतः ।
और जो बिल्कुल न खाये, आ गया हठ योग में, मैं कुछ नहीं खाता। कितने दिन ?

वेद में कथा है कि मन खाने से बनता है। ये वेद में लिखा है। आप लोग जो खाना खाते हैं उससे मन बनता है। एक हिस्सा ऐसा होता है जिससे मन बनता है, एक हिस्सा ऐसा होता है जिससे रस बनता है फिर रस से रक्त बनता है, फिर रक्त से माँस बनता है। ऐसे ही धातुएँ बनती हैं सात, और एक हिस्सा लैट्रीन बन जाता है। ये तीन हिस्से होते हैं, आप लोग जो कुछ खाते हैं।

तो शिष्य ने पूछा कि गुरुजी यह तो ठीक है रक्त वगैरह बनता है। और यह भी ठीक है कि हाँ पाखाना बनता है। लेकिन मन बनता है यह बात मैं कैसे मान लूँ? क्योंकि खाना तो मोटी चीज है। गेहूँ है, चावल है यही सब तो खायेगा, फल खायेगा तरकारी खायेगा। ये मोटी चीजें है भौतिक, और मन तो होता है सूक्ष्म। तो मन का क्या सम्बन्ध है खाने से ? तो गुरुजी ने कहा- हाँ ठीक है फिर बतायेंगे। और दूसरे दिन गुरुजी ने कहा देखो आज से तुम्हारा खाना बन्द अब गुरुजी की आज्ञा हो गई। अब देखो कितने दिन को बन्द करते हैं। दया आ जायेगी गुरुजी को शाम को ही कहेंगे अच्छा खा ले, खा ले। दो दिन, चार दिन, छः दिन, दस दिन, बारह दिन, पन्द्रह दिन, सोलह दिन हो गये, और वो बेचारे को चक्कर आने लगा तो उन्होंने कहा इधर आओ। बताओ तो तैत्तिरीयोपनिषद् के अमुक अनुवाक् का अमुक मंत्र क्या है? उसने कहा गुरुजी !... उससे बोला ही नहीं जा रहा था बेचारे से सोचने की शक्ति भी चली गई सोलह दिन में, मेमोरी, जिससे याद करता है आदमी। तो उन्होंने कहा लाओ खिला दो संतरा-वंतरा का रस दो भाई और दो दिन बाद कहा इधर आना अब बताओ तैत्तिरीयोपनिषद् के उस अध्याय के उसका मंत्र बता दिया। तो उन्होंने कहा बताओ खाने का सम्बन्ध मन से है कि नहीं? हाँ गुरु जी ।

तो शरीर को ठीक-ठीक रखने के लिये भी सामान देना होगा। :- श्री महाराज जी ( भगवद् गीता , भाग -6)

Friday, 15 September 2023

भोजन और भजन

श्री महाराज जी के श्री मुख से -
***********भोजन और भजन *************
नारद भक्ति दर्शन में नारद जी ने एक सूत्र बनाया-
 निरोधस्तु लोक वेद व्यापारन्यासः।

निरोध किसे कहते हैं? 'लोक वेद व्यापारन्यासः' लौकिक वैदिक दोनों प्रकार के कर्मों का न्यास। न्यास क्या है ? तो न्यास कहते हैं 'भगवति समर्पणं न्यासः ।' न्यास शब्द का एक अर्थ तो आप लोग जानते ही होंगे - त्याग, संन्यास। सम् उपसर्ग है और न्यास शब्द है। संन्यासी लोग घर-वर सब छोड़ देते हैं। तो न्यास माने त्याग - लौकिक-वैदिक कर्मों का त्याग कर देना। ये है निरोध। लौकिक-वैदिक कर्म का त्याग हो जाय, उसकी कामना ही गई।

 लौकिक कर्म भी, वैदिक भी। लौकिक कर्म से संसार के विषयों की कामना हम करते हैं और वैदिक से स्वर्गादि लोकों की कामना करते हैं। यज्ञ करो, स्वर्ग मिलेगा। ये करो तो स्वर्ग मिलेगा। तो लौकिक भी, वैदिक भी, दोनों कर्मों का त्याग हो जाय ।

लेकिन, कुछ तो कर्म करने पड़ेंगे। कौन-सा ऐसा भक्त और ज्ञानी है जो कर्म रहित हो जायेगा ? साँस लेगा? हाँ। देखेगा ? हाँ। चलेगा-फिरेगा ? हाँ-हाँ, हाथ-पैर होगा तो चलेगा-फिरेगा। कुछ खायेगा-पीयेगा ? अरे साहब! खाता तो परमहंस भी है। 'पश्वादिभिश्चाविशेषात्।' ब्रह्मसूत्र बनाया गया है वो। तो जैसे पशु वगैरह के लिए खाना आवश्यक है ऐसे ही परमहंस के लिए भी खाना आवश्यक है, शरीर जब तक रखेगा तब तक उसको शरीर सम्बन्धी सामान देना होगा। सब विटामिन प्रोटीन । अगर कहीं गड़बड़ किया तो नेचर दण्ड देगा फिर हरे राम की जगह हरे सिर, हरे पैर, हरे पेट बोलेगा। अरे, कष्ट होगा शरीर में तो फिर उसका चिन्तन करेगा। अरे दो दिन, चार दिन, दस दिन, बीस दिन धींगा-मुश्ती चल जायेगी, हमेशा थोड़े चलेगी।

एक बार गौतम बुद्ध निराहार होकर के ध्यान कर रहे थे, निराहार। कई दिन हो गये तो चक्कर आने लगे। तो कुछ गाँव की स्त्रियाँ गाती हुई जा रही थीं- गाना। उस गाने का आशय ये था कि तानपूरे के तारों को कस कर बजाओ। आप लोगों ने देखा होगा, तानपूरा। उसको कसने को खूँटियाँ लगी होती हैं। गवैये लोग काफी देर तक कस के पहले उसका स्वर- वर मिलाते हैं। अगर वो ढीला रहेगा और आप उँगली चलायेंगे तो आवाज ही नहीं आयेगी। तो तार को कसो लेकिन इतना न कसो कि तार टूट जायें- ये गाना था। तो महात्मा बुद्ध के कान में वो शब्द पड़े तो उन्होंने कहा- ये बेपढ़ी-लिखी गँवार स्त्रियाँ भी कितनी बढ़िया बात कह रही हैं कि बिना कसे ना बजाओ लेकिन इतना न कसो कि तार ही टूट जाय यानी -

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । 
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ (गीता ६.१६)

इसी बात को गीता में भगवान् ने अर्जुन से कहा कि अनाप शनाप खाने से भी साधना नहीं होगी और खाना एकदम छोड़ दोगे, इससे भी साधना नहीं होगी

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
 युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ (गीता ६.१७)

आगे नारद जी भी एक सूत्र लिखे हुए हैं इसी के लिए,
बाकायदा-

लोकोऽपि तावदेव किन्तु भोजनादिव्यापारस्त्वाशरीरधारणावधि । (नारद भ. सू. १४)

तो निरोध ये कि लोक-वेद दोनों प्रकार के फल देने वाले जो भी कर्म हैं, उनको हम त्याग दें, लेकिन कुछ कर्म ऐसे हैं शारीरिक कर्म जिसे कहते हैं वो करने पड़ेंगे। सबको करने पड़ेंगे -

न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । (गीता १८.११)

सारे कर्मों का त्याग कोई देहधारी नहीं कर सकता। तो जितने कर्म कम से कम आवश्यक हैं, उतने कर्म आप कीजिये लेकिन थोड़ा-सा उसमें करेक्शन कर दीजिये। ये कर्म जो आप कर रहे हैं ये भगवान् को अर्पण करके प्रसाद रूप में स्वीकार कीजिये ।

चलो, सबसे जो बेकार का कर्म है, उसकी बात करते हैं। नींद आ रही है, सोना चाहिये। सोना चाहिये ? ये सोना एक कर्म है, नींद लेना एक कर्म है। अब हम सोने चले, अपने सुख के लिये ? नहीं। होशियार हो जाओ यहीं पर, अपने सुख के लिये नहीं। नींद आयेगी तो सपना होगा तो श्यामसुन्दर मिलेंगे, उनकी लीलाएँ देखेंगे। हे श्रीकृष्ण ! आज ऐसी कृपा करना, नींद में तुम खूब हमको दिखाई पड़ो। ये सोच के सो जाओ। ये आपका सोना भी हो गया स्पिरिचुअल अथवा ये सोच लो- जल्दी सो जायें ताकि सबेरे ब्राह्म मुहूर्त में उठकर श्रीकृष्ण भक्ति करें और अगर सोयेंगे नहीं तो फिर शरीर ठीक नहीं रहेगा तो फिर श्रीकृष्ण सेवा वाली बात हमारी बिगड़ जायेगी। चलो, ऐसा सोच लो, यानी अपने प्रत्येक कार्य भगवान् को अर्पित करो फिर प्रसाद लो। उद्धव सरीखे ज्ञानी परमहंस ने कहा श्रीकृष्ण से

त्वयोपभुक्तस्रग्गंधवासोऽलंकारचर्चिताः ।
उच्छिष्टभोजिनो दासास्तव मायां जयेमहि ॥ (भागवत ११.६.४६)

आपका उच्छिष्ट सब सामान मालायें, वस्त्र, आभूषण, इत्र, सबका सेवन करेंगे। आपको चढ़ाकर, देकर, समर्पित करके प्रसाद रूप में उसको ग्रहण करेंगे तो वो हानिकर तो होगा ही नहीं अपितु इतना लाभकर हो जाएगा कि 'तव मायां जयेमहि।' चैलेंज कर रहे हैं उद्धव परमहंस, आपकी माया जो आपकी पॉवर के बल पर अकड़ा करती है । -
शिव चतुरानन देखि डेराहीं

उस पर विजय प्राप्त कर लेंगे हम महाराज ! केवल प्रसाद सेवन से, यानी समर्पित किया और फिर सेवन किया। हर क्रिया में। खुजली हो रही है, अब खुजलाने चले। ध्यान रखो, अपने सुख के लिये न खुजलाओ। खुजा रहे हैं। हँ ऽ वो खड़े हैं, उनको हँसी आ रही है, हँसो हम खूब खुजा
लेंगे और हँसो। किसी न किसी बहाने से हम उनको सामने खड़ा रखें। कोई भी क्षण हमारे लिए कोई कर्म का ऐसा न हो कि उनको माइनस करके हम कर्म कर अकेले कर्म किया कि बँध गये, मरे। हर कर्म में। हैं। बस,

इस सूत्र का एक अर्थ और भी कुछ महात्माओं ने किया है। वो कहते हैं - लौकिक कर्म भी करो, वैदिक कर्म भी करो लेकिन वो जो यहाँ न्यासः कहा गया है, तो वो कहते हैं भगवान् को समर्पित कर दो। जैसे- हम रागानुगा भक्ति के अनुसार आपको बता रहे हैं कि जितने में काम चल जाय ऐसे शारीरिक कर्म करो लेकिन उसको भी समर्पित करके प्रसाद रूप में। और वे लोग जो इस सूत्र का अर्थ करते हैं, कर्मयोगी लोग, वो कहते हैं कि वेद के अनुसार और लोक के अनुसार कायदे-कानून से सब कर्म करो लेकिन भगवान् को अर्पित करके करो। उनको अर्पित करो यानी हर कर्म के समय उनका स्मरण हो। अपने में कर्तृत्व की बुद्धि न आने पाये। मैं कर्ता हूँ, ऐसी फीलिंग न हो।
 :- श्री महाराज जी ( भगवद् गीता भाग -6)

Thursday, 14 September 2023

सनातन वैदिक धर्म के विरोधी लोगों या अपराधियों को समाप्त करने भगवान स्वयं क्यों नहीं आते ? इनका विनाश वो कैसे और कब करते हैं ?

कुछ ऐसे नास्तिक मनुष्य जिनको सनातन वैदिक धर्म, सनातन भगवान में, उनके संतो में श्रद्धा का आभाव है , संशय है , वो अक्सर पुछते है कि भगवान गलत कर्म करने वाले लोगों के मुखिया को , सरदार को, लीडर को , यानि जो नास्तिकों का मुखिया होता है , जो खुद तो गलत करता है और दुसरे को भी गलत करने के लिए प्रेरित करता है उसका विनाश क्यों नहीं करते अगर है तो ?
क्यों छोटे छोटे अपराध करने वाले का सबसे पहले सफाया हो जाता है पर गलती के सरदार को , नंबरी गुंडा का सफाया सबसे अंत में होता है ? 
इसका मतलब भगवान अन्यायी है ! ऐसे प्रश्न होते हैं कुछ लोगों का । 

तो सबसे पहले मैं उनको यह कहना चाहुंगा कि शास्त्र कहता है -

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।।4.40।। (भागवत )

यानि अज्ञानी तथा श्रद्धारहित और संशययुक्त मनुष्य नष्ट हो जाता है,  उनमें भी संशयी जीव के लिये न यह लोक है,  न परलोक और न दोनों लोकों का सुख अत: उनका नाश निश्चित है वो भी बुरी तरह से ।। 

 भगवान के बहुत से लीला आदि साधारण लोगों के समझ से परे होता है । 

मैं तो केवल बस उस ओर उनकी दृष्टि ले जाने चाहता हुं कि इसका क्या मूल कारण है , आप खुद ही जान जाएंगे ।

तो सुनिय ,  यही प्रश्न एक बार भईया बलभद्र श्री कृष्ण से पुछ बैठे थे , कि तुम हर बार युद्ध में  जरासंध का साथ देने वाले सभी राजाओं को तथा उसकी सेना का सफाया कर देते हो, पर जरासंघ को छोड़ देते हो ऐसा क्यों ? सभी दुष्टों के इस सरदार को क्यों छोड़ देते हो तुम  । यह बार बार फिर हमसे युद्ध करने आ जाता है दुसरे दुष्ट राजाओं को साथ लेकर , दुसरे के साथ गठबंधन करके , उससे दोस्ती करके ?
हमें हर बार इससे युद्ध करना पड़ता है , आज सत्रहवां बार तुम उसको छोड़ दिये हो , और जब इसका बद्ध करने की बारी आती है , रण छोड़ कर तुम भाग जाते हो ? 

भगवान श्री कृष्ण ने ज़बाब दिया  भईया । अगर इसको सबसे पहले मार दुंगा तो फिर वांकी  छोटे छोटे राक्षसों का , दुष्ट मनुष्यों का , पापियों का विनाश नहीं हो पायेगा । 

इसको इसलिए छोड़ देता हुं ताकि यह अधिक से अधिक संशयात्मा को इकट्ठा करके, छोटे छोटे अपराधियों को , दुष्टों के जमात को इकट्ठा कर , भगवद् विश्वास रहित जीव , सनातन धर्म विरोधी जीवों को इकट्ठा करें और सबसे पहले उसका विनाश हो सके  । 

संशयात्मा एक ऐसा बीज है जो कई गुणा अधिक गलत लोगों के समुह को खड़ा कर देता है समाज में , जो भोले भाले श्रद्धावान लोगों को सताता है , समाज में व्यभिचार का वाहक होता है । 
ऐसा जीव जो खुद पर और ईश्वर पर भरोसा ना करें और  दुसरे गलत लोगों के बहकावे में आ जाए , उसके पास भगवान के प्रति ना श्रद्धा हो और ना विश्वास हो , जो दुष्कर्म करने वाले अन्याय , अत्याचारी के बहकावे में झट से आ जाए उनका मानव जीवन व्यर्थ है  । अत: उसका मानव शरीर भी व्यर्थ है , इसलिए उससे सबसे पहले ऐसे जीवों का  मानव शरीर में छीन लेता हुं किसी अन्य को माध्यम बना कर और सबसे अंत में उस दुष्ट सरदारों का सफाया करवाता हुं यह मेरी रणनिति है  । 
भइया अगर मैं सबसे पहले रावण , कुंभकर्ण , कंस आदि को मार देता तो छोटे छोटे राक्षसों का विनाश कैसे हो पाता , वो तो बच जाते , छुप जाते  । पृथ्वी का भार इन दुष्टों से कैसे कम होता भला ?
इसलिए मै जरासंध को सत्रह बार छोड़ दिया ।अगली बार भीम भईया से इसको समाप्त करवा दुंगा । अगर स्वयं मारूंगा तो मुझे इनको अपना लोक देना पड़ेगा । इसलिए इनको मारने के लिए मैं स्वयं नहीं आता । इनको मारने के लिए मैं अन्य माध्यमों का इस्तेमाल करता हूं । 

तो इससे हमें शिक्षा मिलती है कि कोई अगर किसी को भगवान के खिलाफ करता है, असली महापुरूषों से,  संतों के खिलाफ भड़कता है , उनसे दुर करने का कुकृत्य करता है तो भड़काने वाले को सबसे अंत में भगवान सजा देते हैं और  भड़कने वाले जीव का सफाया सबसे पहले होता है । 
:- संजीव कुमार , रांची । 🙏❤️🙏