Tuesday, 14 November 2023

कृपालु क्यों आया है, अपने लिये आया है क्या ? इतना परिश्रम करता हुं तुम लोगों के पिछे , पर जरा भी परवाह नहीं तुम लोगो को , तुम लोग मुझसे प्यार नहीं करते ।

“ मैं क्या करूं अब , तुम लोगों को लठिया ले के मांरू क्या ? रात दिन तुम लोगों के पिछे परा रहता हुं, तुम्हारे हीं कल्याण के लिए, लेकिन तुम लोगों ने ठान लिया है मनुष्य जीवन ऐसे हीं गवा लेने का ।
कृपालु क्यों आया है, अपने लिये आया है क्या ? इतना परिश्रम करता हुं तुम लोगों के पिछे , पर जरा भी परवाह नहीं तुम लोगो को , तुम लोग मुझसे प्यार नहीं करते । 
अगर प्यार करते तो जो मैं कहता उसको जरूर मानते और करते, पर तुम लोगों को मेरे आने का महत्व हीं नहीं है । 
भगवान ने मुझे भेजा है तुम लोगों के कल्याण के लिए, पर तुम लोग मेरी बात सुनते हो , मुंडी भी हिलाते हो पर जो बतलाया गया है उसको करते नहीं , कुछ लोग तो साधना के समय घर संसार की बातें करने में व्यस्त रहते है यहां , मैं यहां से बैठ कर सबको देखता रहता हुं, अरे जब यहां धाम में भी अपने संसार को लेकर आते हो तो क्या जरूरत यहां आने की ? 

मैं वो बाबा नहीं जो भीड़ को देख कर खुश हो जाए , चढ़ावा देख कर खुश हो जाए , मै तुम्हारा असली माता पिता हुं । मुझे तुम्हारे कल्याण की चिंता है । 

तुम सब नहीं जानते की मैं तुम सबको कितना प्यार करता हुं, तुम सबकी कितनी चिंता करता हुं , अब कलेजा चीड़ के दिखाऊं क्या ? 
जितना तुम्हारे माता पिता , तुमसे प्यार नहीं करते हैं उससे लाख गुणा तुम्हरा ये बाप तुमको प्यार करता है । पर तुम सब लापरवाही करते हो । 

यह बहुत बड़ा नुक़सान है तुम लोगों का । 
जब मानव शरीर छुटेगा तब पता चलेगा की मेरा असली बाप हमको कितना समझाया ! कितना श्रम किया मेरे पीछे , कितना प्यार किया और करता है मुझे पर हम अपना अनमोल मानव देह गवां लिये । 
कृपालु तब कुछ नहीं कर सकेगा । इसलिए कहता हुं इतना तो करलो की फिर से मानव शरीर मिल जाए और तब कृपालु की बात को मान करके , फिर से साधना करके भगवद् प्राप्ति करके सदा के लिए भगवान का लोक प्राप्त कर लोगे , आनंद मिल जाएगा ।

जितना समय शरीर के लिए देना है बस उतने समय के बाद तुम लोग मन हीं मन राधाकृष्ण की भक्ति करो , साधना करो ।
मत परो संसार के प्रपंच में , संसार की बातें करने से तुमको क्या मिल जाएगा ? कुछ नहीं । 
समय मिलते ही तुम लोग आपस में बात करने लगते हो संसार का , वो ऐसा है वो वैसा है , क्या फायदा इससे , अरे जिसको कृपालु नहीं सुधार सका उसको तुम सुधार लोगे क्या ?

तुम लोग अपने कल्याण की सोचों , जो नहीं समझता है, ठान चुका है कि मानव देह गवां करके हीं छोड़ेगें , जाने दो उसको , किसी के प्रति दुर्भावना मत करो । किसी में बुराई मत ढुंढो , अपनी कमी देखो की तुम कहां हो ? कितना आगे जाना है , साधना की स्पीड बढ़ाओ । 
तुम प्रयास करोगे तो मुझे खुशी मिलेगी , फिर कृपालु भी तुमको आगे बढ़ाने में और मदद करेगा । 
पर जब तुम चलना हीं नहीं चाहोगे तो कृपालु क्या कर लेगा ? 
इसलिए आप सब अपना बांकी बचा किमती समय साधना में लगाओ । जब भी चर्चा करो आपस में तो केवल भगवद् चर्चा करो , साधना करो , थक जाओ तो मन हीं मन राधे राधे करते रहो । 

कम से मानव शरीर दुबारा प्राप्त करने के लिए परिश्रम करो । कृपालु तो तुम्हारे लिए परिश्रम कर हीं रहा है, अपना मानव जीवन सार्थक कर लो । दुसरे निकृष्ठ योनि में न जाना परे फिर से , ऐसा सुनिश्चित करलो , फिर मैं तुमलोगो को मिल जाऊंगा , जहां भी मिलु , जिस रूप में मिलु पर मिल जाऊंगा , तुमको ढुंढ लुंगा , जैसे इस जीवन में मिला , ढुंढ लिया, ठीक वैसे हीं कृपालु तुमको फिर ढुंढ लेगा, इसकी चिंता तुम मत करो , तुम अपना काम करो जैसे बताया है मैंने , मैं अपना काम करूंगा । 

नहीं तो मानव शरीर दुबारा नहीं मिला भगवान के द्वारा तो कृपालु फिर कुछ नहीं कर पायेगा तुम्हारे लिए । 
इसलिए अगर मुझसे थोड़ा भी प्यार करते हो तो मेरी बताई बात को मानो और करो । सिर्फ मानने से कुछ नहीं होगा , करने से होगा । संसार में भी सिर्फ प्लान बनाने से कोई काम नहीं होता , करने से होता है ।
इतना तो तुम लोग जानते हीं हो । “
                                       - जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज

Monday, 13 November 2023

समुद्र मंथन का रहस्य

एक भाई के शंका का समाधान । 
Abhiram Kuwar जी ने पुछा है कि :- राधे राधे संजीव भैया !🙏
एक प्रश्न है जो परेशान कर रहा है ।
वह यह कि समुद्र - मंथन वाली एक घटना से हमें पता चलता है कि मोहिनी रूप में विष्णु ने देवताओं को अमृत - पान कराया था जिसके कारण देवता अमर हो गए । वहीं, विष्णु की मंशा भाँपकर राहु नामक एक राक्षस चुपके से देवताओं की पंगत में जा बैठता है । पवन देव उसे देख लेते हैं और विष्णु को इशारा कर देते हैं । विष्णु तुरंत सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट देते हैं किंतु तब तक अमृत की कुछ बूंदें उसके गले से नीचे उतर चुकी होती हैं । परिणामतः वह भी नहीं मरता बल्कि उसका कटा हुआ सिर राहु तथा धड़ केतु के नाम से अमर हो जाते हैं । 
दूसरी तरफ, हमें मालूम है कि देवताओं  का पुण्य क्षीण होने के पश्चात उन्हें वापस कुकर - शूकर बनना पड़ता है अर्थात उनका जीवन - चक्र पुनः नियमपूर्वक प्रारंभ हो जाता है ।
यह विरोधाभास क्यों? आशा है, मेरे प्रश्न का आप अन्यथा नहीं लेंगे अपितु शंका समाधान करना चाहेंगे । धन्यवाद! राधे राधे 🙏

उत्तर -  एक कल्प यानि चारों युग  के काल ( अबधी ) को जोड़ कर 71 से  गुणा करते हैं तो एक मन्वंतर होता है इसको 14 से गुणा कर दिजिए तो जितना हिसाब बनेगा  इतने  साल का एक कल्प होता है जो ब्रह्मा जी  के एक दिन के बराबर होता है और इतने हीं काल  का उनका एक रात होता है  और इतने हीं दिनों की देवता की आयु होती है उनके एक दिन यानि एक मन्वंतर  के बराबर  या कुछ देवताओं का उम्र एक कल्प के लिए भी होता है ,  इसलिए  देवताओं का अमरत्व एक मन्वंतर  के लिए होता है ना की अनंत काल तक के लिए या अनंत कल्प  के लिए। लेकिन कुछ देवता का उम्र एक कल्प के बराबर या एक से अधिक कल्प के लिए भी होता है उनके पुण्य के आधार पर । अत: सभी के अपने-अपने अलग-अलग उम्र है 
इसको अब गणित से समझिए -

चार युग होता है न - सतयुग 17,28,000 वर्ष, त्रेता 12,96,000 वर्ष , द्वापर 8,64,000 वर्ष एवं कलियुग 4,32,000 वर्ष का होता है । तो चारों को मिला कर हुए 43,20,000 वर्ष जिसको चार युग कहा जाता है । ये 71 बार बीतने पर एक मनवंतर होता है । ऐसे चौदह मनवंतर बीतने पर ब्रह्मा का एक दिन यानी 43,20,000 से 71 को गुणा करने से 30,67,20,000 वर्ष और इसमें 14 से गुणा करने से  4,29,40,80,000 वर्ष का दिन  और इतने हीं वर्षों की ब्रह्मा जी एक रात होती है ।  ब्रह्मा के एक दिन में 14 मन्वन्तर होतें हैं जैसे स्वयंभुव , उत्तम , तामस , रैवत, वैवस्वत, सावर्णि, दक्ष सावर्णि , ब्रह्म सावर्णि , धर्म सावर्णि , रुद्र सावर्णि , देव सावर्णि , इन्द्र सावर्णि इत्यादि । वर्तमान, जो मन्वन्तर चल रहा है , वह है सातवाँ मन्वन्तर , जिसका नाम है वैवस्वत ।
तो 14 मन्वंतर बीत जाने के बराबर एक कल्प होता है , जो ब्रह्मा जी का एक दिन होता है और इतने काल का उनका एक रात भी होता है ।  उनके एक दिन यानि एक कल्प के दिन बाले भाग में सृष्टि का उदय रहता है और उनका एक दिन यानि एक कल्प के दिन बाला भाग के अस्त होने पर प्रलय हो जाता है और सृष्टि भगवान के महोदर में चला जाता है  ।
जिस प्रकार हम रात होने पर सो जाते हैं तो सोते समय गहरी निंद में हमको कुछ मालुम नहीं रहता । उसी प्रकार पुरी सृष्टि सो जाती है  यानि निष्क्रिय हो जाती है ।‌
तो ब्रह्मा जी के जागृत अवस्था वाली एक दिन यानि एक कल्प के एक मनवंतर के  बराबर देवताओं को अमरत्व मिलता है उस अमृत से तथा इसी अमरत्व के कारण वो हमेशा युवावस्था में बने रहते हैं तथा स्वस्थ रहते हैं स्वर्ग में जीवन के अंत तक, पुण्य क्षीण होने तक  । कुछ ऐसे भी देवता हैं जिनका उम्र एक चतुर्युगी या किन्ही का एक कल्प भी होता है ‌किन्ही का दो कल्प आदि अपने अपने पुण्य के अनुसार। 

लेकिन उनके पास कर्म करने के लिए मानव शरीर नहीं है , उनके पास  शरीर सूक्ष्म शरीर है जिससे नया कर्म करना संभव नही‌ है । देवता का शरीर भोग शरीर है , स्वर्ग का सुख भोगने के साथ साथ उनका पुण्य क्षीण होते रहता है पल पल ।   अंत में सभी पुण्यो के समाप्ति के बाद उनको निकृष्ट योनि में जाना परता है मृत्यु लोक में । 
 अत: उनको भी कुकर शूकर की योनि में जाना परता है और फिर दुसरा जीव इंद्रादिक आदि देवता बनते हैं ‌, यानि ब्रह्मा जी जब एक कल्प यानि अपने एक दिन के बाद रात आने पर एक रात यानि एक रात के बराबर कल्प में सो  जाते हैं तो उनके सोने के काल में यह पुरा चतुर्युगी ब्रह्मांड प्रलय काल में भगवान के महोदर में पेंडिंग में चला जाता है परा रहता है  एक कल्प तक , जब तक ब्रह्मा जी सोय रहते हैं तब तक । फिर जब रात वाली एक कल्प बीत जाती है तो भगवान चतुरर्मुखी ब्रह्मा जी के ब्रह्मांड का फिर से सृष्टि कर देते हैं अपने संकल्प शक्ति से,  फिर ब्रह्मा जी अनेकों जीवों को प्रकट करते हैं और भगवान का फिर से सभी लीला दुहराया जाता  है फिर दुसरे जीव जो  देवता बन कर आते हैं  वो लोग अमर होते हैं यह चक्र चलता रहता है  । अत: देवताओं का अमरत्व सिमित समय के लिए मिलता है ,  अनंत काल और अनंत कल्प  के लिए कदापी नहीं । आशा है आप समझ गए होंगे । श्री राधे 🙏❤️🙏

Saturday, 11 November 2023

ब्राह्मण का धर्म और कर्तव्य।

ज्ञानयोग तथा भक्तियोग द्वारा ब्रह्म से साक्षात्कार करना और अन्य जीवों को कराना हीं ब्राह्मणों का एक मात्र धर्म तथा कर्तव्य है । वेदानुसार , शास्त्रानुसार तत्व ज्ञान हासिल करना एवं न्याय, निति, नैतिकता, कर्तव्य-परायणता, ईमानदारी, त्याग , दया , करूणा , एवं उच्च आदर्श, सिद्धांतों आदि का पालन करना तथा दुसरे जीवों को उस पर चलने के लिए प्रेरित करना, समाज में समरसता तथा सामंजस्य स्थापित करना ही ब्राह्मणों का मुख्य लक्ष्य , उत्तरदायित्व तथा कर्तव्य, सनातन धर्म में निर्धारित किया गया है । :- आचार्य चाणक्य का कथन ।।

आज अधिकांश ब्राह्मण, समाज में अपना सम्मान खो रहा है , क्योंकि आज अफसोस कि बात यह है कि इस कलयुग में 90% ब्राह्मणों के बात-व्यवहार से , सोंच से , चाल चलन से ऐसा लगता है कि हमारा ब्राह्मण समाज खुद पथ-भ्रष्ट होकर पतन कि ओर अग्रसर हैं , मांस मदिरा का सेवन ,‌ झूठ , व्यभिचार, अन्याय , अनिति , अधर्म , अज्ञानता , और सभी प्रकार के माया के दुर्गुणों से युक्त अधिकांश ब्राह्मण समाज हर प्रकार से आज अपने हीं जमीर का दमन दिन रात करते रहते हैं तथा तर्क को छोड़कर कुतर्क , वितर्क , अतितर्क से स्वयं के तुष्टिकरण में जुटे हुए है । 
यही कारण है आज अधिकांश सनातन समाज दिशाहीन हो चुकि है और गर्त में जा रही है । ब्राह्मणों कि दशा और दिशा देख कर इन पर बड़ा तरस आता है । आज ऐसा अनुभव प्रायः हो रहा है कि दुसरे वर्गो कि तो कुछ उन्नति हो रही है लेकिन हमारा अधिकांश ब्राह्मण समाज आज किस दिशा में जा रहा है , वो किसी से छुपी नहीं है , भगवान सब देख रहे हैं और व्यथित हैं ।  
आज बदलते युग में , समय के अनुसार ब्राह्मण पुत्र पुत्री डौक्टर , बने , इंजिनियर बने वकील बने बहुत अच्छी बात है पर अधर्म अनिति , अन्याय , मांस, मदिरा का सेवन, व्यभिचार तथा शास्त्रों के विपरित, धर्म विरूद्ध आचरण कम से कम ब्राह्मणों से अपेक्षित नहीं - संजीव कुमार ।।

Wednesday, 8 November 2023

दान का महत्व।

श्री महाराज जी से एक साधक जिज्ञासा की थी समझाने के लिये कि :-  हम सभी साधक गण महाराज जी के आश्रम में,  धाम में आते हैं और रहते हैं, उनके यहां का स्वादिष्ट खाना खाते हैं जिसका लाभ हानी क्या हैं ? 
श्री महराज जी ने बड़े सरल तरीके से समझाया है जो मै आपसे शेयर कर रहा हूँ | 

प्रश्न का जबाब देते हुए श्री महाराज जी ने कहा की आप लोग आश्रम में आते हैं रहते हैं खाते पीते हैं | मै तो एक श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ट ब्राह्मण हूँ तो कुछ लोगों ने मतलव लगाया की उनको पाप लगेगा ! 
महाराज जी ने हंसते हूए कहा की अरे भाइ देखोऽऽऽ मैं तो कमाता वमाता नही हूँ | ऐ सब तो आपलोगों का ही है | आपलोगों का दिया हुआ आपही लोगों के सेवा में लगता रहता है | मेरे पास तो कुछ भी नही है ,मेरा एक भी बैंक एकाउंट तक नहीं है , मेरे नाम पर एक गज जमीन भी नहीं है , एक पेन तक मेरे पास नहीं  | ये सब जो देख रहें है ये सब आपही लोगों का आपही की सेवा में लग रहा है | फिर भी अगर आपको लगता है कि श्रोत्रिये ब्रह्मनिष्ट ब्राह्मण का खाने से पाप लगेगा जो की शास्त्रानुसार सही भी है तो जाने के समय यथा शक्ति अपनी इच्छानुसार दान खाते में दान दे दिजिये ! इससे तो आपही का कल्याण होगा | आपका ही लोक परलोक दोनों बनेगा | 
भगवान तो उनके भक्त के निमित्त निष्काम दान देने वाले से बड़ा खुश होते हैं, बड़ा प्यार करते हैं , उसका योग क्षेम वहन करते हैं, उसको जो मिला है उसकी रक्षा करते हैं और जो अप्राप्य बस्तु  है वो भी देते हैं । साथ साथ संत महापुरुष अपने अनुयायियों से प्राप्त धन को जीव की सेवा में हीं लगा देतें है, जिसका फल दान करने वाले को हीं मिलता है । वो भी लाखों  गुणा । तो आप लोग जो दान करेंगे करते हैं  तो आपहीं का बढ़ीया प्रारब्ध बनेगा, इसलिए  प्रत्येक जीव को दान पर विशेष जोर देना चाहिए । धन से सेवा , तन से सेवा और नहीं कुछ है आभाव है धन का और तन का तो मन से मानसी सेवा जरूर करना चाहिए । 
और धन है , तन भी है और फिर भी केवल मानसी सेवा कर रहे हैं तो ये चालाकी है । इसका मतलव धन से आसक्ति है, ये नहीं चलेगा । 
मन से तो सभी को करना हीं है चाहे जिसके पास धन हो या ना हो , तन हो या ना हो , पर जिसके पास धन है उसको धन से सेवा अवश्य करना चाहिए , धन के दान में मन को डिसिजन लेना परता है , मन में धन से आसक्ति हटा कर धन दान करने में धन और मन दोनों लगता है , इससे बहुत लाभ है । 
हां अगर किसी के पास दस रूप्या भी नहीं , दो रूप्या भी दान करने में बेचारा सक्षम नहीं पर भीतर से यह सोचता है कि हमारे पास दो रूप्या होता तो दान करते , रोता है बेचारा अंदर हीं अंदर की दान करने में भी मैं सक्षम नहीं, इतना दीन है वो ,  तो उसको मन से दान करने में लाभ होता है उसका भी लोक परलोक बनता है । 

पर आज संसार में ऐसा कोई नहीं की उसके पास दो रूप्या भी नहीं है , अरे नहीं है तो भिक्षा मांग कर खाते हो तो भिक्षा मांग कर थोड़ा  दान जरूर करो । 
शरीर तो है ना जिससे भिक्षा मांग कर पेट भर रहे हो अपना तो दान भी करना चाहिए भिक्षा मांग कर । 
इससे दरिद्रता मिटेगी । 

अपलोग तो जानते हैं सुदामा के पास खाने के लिए भी नहीं था,बहुत दरिद्र था , उसके घर में थोड़ा सा चावल था । वही थोड़ा सा एक मुठ्ठी चावल लेकर गया भगवान के लिए , और शर्म से नहीं दे रहा था उनको की एक मुठ्ठी चावल देंगे तो भगवान के महल में उनकी श्रीमति जी के सामने हंसाई होगी ,  भगवान वो चावल छीन कर खाये और सबकुछ दे दिया सुदामा को, भक्ति-वक्ति, लोक भी और परलोक भी सबकुछ । 
जब वो घर लौटा तो अपने झोपड़ी के जगह महल पाया,  

आपलोगों में से बहुत लोग दान नहीं करना चाहते । वो तो मैं आपके पीछे पड़ा रहता हुं आपही के कल्याण के लिए । आप लोग जो दान करते हैं वहीं आपको भगवान हजार गुणा बना कर देते हैं , आपलोग देखते हैं एक  कड़ोरो कमा रहा है थोड़े से श्रम में ,‌ वो पिछले जन्मों में खूब दान पुण्य किया रहा होगा । और एक बेचारा दिनरात मेहनत कर रहा है फिर भी उसको खाने के लाले हैं , उसने दान नहीं किया । तो ए दान वान सब आप अपने लिए करते हैं , अपना लोक परलोक बनाने के लिए ।  दान के बल पर जीव स्वर्ग का सम्राट तक बन जाता है जैसे हरिश्चंद्र, राजा रघु आदि । वशर्ते कि दान सही जगह, सही पात्र में हो । गलत व्यक्ति को किया गया दान नरक भी दिला देता है । 

तो आज संसार में ऐसा कोई नहीं जो सुदामा से भी अधिक निर्धन हो , दरिद्र हो । अत: दान सबको करना चाहिए । 

हां अब धन भी नहीं और तन भी नहीं भिक्षा मांगने के लिए , दुसरे पर आश्रित है पुरी तरह से तन के लिए भी तो ऐसे जीव मन से भी दान कर सकता है । उसको भी वही फल भगवान देते हैं जो एक करोड़ दान देने वाले को देते हैं । तो कलयुग में दान अवश्य करना चाहिए , क्योंकि कलयुग में दान करने का बहुत अधिक महत्व है । 
"दानमेकं कलयूगे "
और अगर दान नहीं करोगे तो दरिद्री बनोगे इस जन्म में भी और अगले जन्म में भी । 
:- श्री महाराज जी के प्रवचन विडियो से , स्थान , ब्रजगोपिका सेवा मिशन , टांगी ।

Friday, 3 November 2023

सही और ग़लत में फर्क समझ कर गलत से दूर रहें ।

श्री महाराज जी द्वारा दिया गया तत्वज्ञान कहता है कि भगवान कण कण में हैं । बाघ में भी और बकरी में भी, जहर में भी हैं और अमृत में भी, मंदीर में भी है और मदिरालय में भी । 
साधु में भी हैं और दुष्ट में भी, लेकिन फिर भी गुण का फर्क है, अत: गुरू युक्त बुद्धि यानि गुरू प्रदत्त ज्ञान , विवेक से बिना किसी के साथ दुर्भावना किए गुणात्मक अंतर पहचान करके सांप और साधु में फर्क करके साधु का हीं संग करना कल्याणकारी है । 

अगर जहर और अमृत में फर्क नहीं समझेंगे तो जहर से दुर और अमृत को ग्रहण कैसे करेंगे हमलोग ??? फर्क तो करना पड़ेगा । अच्छे बुरे जीव का पहचान करना पड़ेगा, पर गुरू प्रदत बुद्धि से , अपनी नजरिया से कदापी नहीं । 
और विवेक के लिए श्रोत्रिए एवं ब्रह्मनिष्ट महापुरुषों का संग करना पड़ेगा और तभी उनकी कृपा से विवेक प्राप्त कर पाएंगे । और हां संग भी मन से हीं करना होगा । शरीर से हो या ना हो कोई बात नहीं । 

क्योंकि :- 
बिनु सत्संग विवेक न होई। रामकृपा बिनु सुलभ न सोई।।

दुष्ट को , दुर्जन को , राक्षसों को , आसुरी वृत्ति बाले जीव को गलत समझने में , पहचान करके अलग रहने में , दुष्ट को दुष्ट कहने में , गलत को गलत कहने में कोई पाप नहीं । पाप तो तब होता है जब हम उससे मन के भीतर से दुर्भावना रखें और फिर गलत कहें गलत जीव को । 

तो श्री महाराज जी के तत्वज्ञान को हमें ठीक से समझना होगा , ग्रहण करना होगा । उत्तम जीव और निम्न कोटी के जीव में फर्क समझना , गलत का पहचान करना और उससे दुर रहना गलत नहीं है । वल्कि गलत जीव से भी किसी प्रकार का दुर्भावना करना , उसके प्रति राग और द्वेष मन में रखना गलत है । 

अगर यह बात हर हमेशा ध्यान में रहे कि श्री महाराज जी कि पुरी फिलौसफी मन पर केंद्रित है । किसी भी जीव के शारीरिक व्यवहार , बाहरी व्यवहार , एक्टींग से उनके फिलौसफी का कोई मतलव नहीं । हरि गुरू मन में उठे संकल्पों को हीं केवल नोट करते हैं और उसी के अनुरूप फल मिलता है जीव को । 
अर्जुन ने , हनुमान जी ने , बड़े बड़े ऋषि मुनियो ने अनेकों मर्डर किए हैं , दुष्टों पर , असुरों पर , गलत जीवों पर क्रोध किए हैं पर बिना किसी दुर्भावना के । इसि प्रकार हमें भी बिना किसी दुर्भावना के गलत का त्याग , या उससे उदासीन और फिर भी वो न माने तो उस पर भीतर से मन से बिना दुर्भावना किए क्रोध करने में कोई पाप नहीं है । किसी के भलाई के लिए उस पर क्रोध करना ग़लत नहीं है बशर्ते कि यह लिमिट में हो तथा स्वार्थमूक्त हो । बच्चे के भलाई के लिए उसे डांटना गलत नहीं है । 

जो व्यक्ति श्री महाराज जी के फिलौसफी को केवल किसी के शारीरिक आचरण , बाहरी व्यवहार तक सिमित समझते हैं वो श्री महाराज जी के फिलौसफी को कभी समझ हि नहीं पाएंगे और न कभी कोई लाभ लें पाएंगे । 
श्री महाराज जी का पुरा फिलौसफी मन को शुद्ध करने और तथा मन के द्वारा चिंतन, संकल्पों पर हीं आधारित है ।
श्री महाराज जी गीता के श्लोक को कोट करके बार बार हमें समझाया है :- 
मनएव मनुष्यानाम् कारणम् बंध्य मौक्षयो ।। ( ब्रह्म बिंदु उपनिषद) 
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुष्मर युद्ध च :- गीता । 
भगवान कहते हैं अपनी मन बुद्धि को मुझे समर्पित करके युद्ध करो, शरीर को नहीं ।
 आज गीता अधिक प्रासंगिक है हमारे लिए ।
आज हम युद्ध किससे करें तो अपने दुर्गुणों से (अपने ही मन के गलत प्रवृतियों जैसे - काम क्रोध मद् मोह लोभ , ईर्ष्या राग द्वेष आदि से ) हथियार क्या है? तो सत्संग? । भगवन नाम है ? रुपध्यान सहित उनका गुणगान है ? स्मरण , भजन , किर्तन है , गलत संगती का त्याग और उत्तम का हमेशा संग , भगवद् जनों का संग शरीर के साथ साथ मन से करना है । केवल शरीर से दुर रहें पर मन में गलत लोगो का चिंतन हो यह बड़ा घातक है । 
अत: जबतक श्री महाराज जी के फालौसफी हम ठीक से मन से ग्रहण नहीं करेंगे , अनंत जन्म बीत जाएगा साधना करते कोई लाभ नहीं होगा हमें । 
श्री राधे ।

Friday, 27 October 2023

लोक व्यवहार की कला

श्री महाराज जी द्वारा दिए गए लोक व्यवहार की कला पर प्रवचन का सार , अंश :- 
संसार में सब के साथ एक जैसा व्यवहार नहीं चल सकता, सबके साथ हर समय विनम्रता दीनता नम्रता सहिष्णुता का व्यवहार करने वाला व्यक्ति कभी सफल नहीं हो सकता, संसार में बाहर से काम का , क्रोध का ,‌ लोभ का, मोह का व्यवहार करो, एक्टींग करो जहां जरूरत हो वहां,‌ लेकिन यह ध्यान रहे कि भीतर गड़बड़ न होने पावे किसी के प्रति, भीतर से ,‌ह्रदय के अंदर से किसी के प्रति दुर्भावना नहीं होने पावे , भीतर हमेशा याद रहे कि सबमें हमारे ईष्ट बैठे हैं , हमारे श्याम सुंदर बैठे हैं , राक्षसों में भी , दुष्टों में भी । 

अर्जुन ने, हनुमान जी ने लाखों मर्डर किए पर भीतर गड़बड़ नहीं था इसलिए भगवान ने उनके इस कर्म को नोट नहीं किया । 
संसार में सबके साथ हर किसी से दीनता का नम्रता का व्यवहार कोई करेगा तो दुष्ट लोग उसे जीने नहीं देगा । 
कोई तुमसे गलत बात कर रहा है, तो हट जाओ , उठ के चले जाओ वहां से । फिर भी वो न माने तो 
डांट दो उसको, झिड़क दो उसे । 
पर भीतर से दुर्भावना नहीं होने पावे किसी के प्रति यह ध्यान रहे । 
अरे रात दिन आप लोग रोज ऐसा व्यवहार करते हैं संसार में । 
आपका बेटा बेटी पढ़ाई नहीं कर रहा है , आप समझाते हैं पहले , फिर भी बदमाशी किया तो , लगाऊं क्या दो थाप , ऐसा बोलते हैं । फिर भी नहीं माना तो आप दो थप्पड़ लगा भी देते हैं , पर भीतर से उसके कल्याण कि हीं भावना होती है आपमें , ठीक वैसे हीं दुसरे के साथ भी व्यवहार करना है । कोई गलत बोल रहा है , पहले समझा दो उसको , नहीं समझा , हट जाओ वहां से , फिर भी नहीं समझा, परेशान किया , डांट दो उसको । 
अब आपके घर में कोई आता है, गलत बात करता है बोल दो उसको हाथ जोड़ कर ,‌वो हं हं हं आप यहां से चले जाईए , आपके यहां अब और रहने से यहां का माहौल खड़ाब होगा इसलिए आप कृप्या चले जाइए । ' गेट आऊट" ऐसा नहीं बोलो । 
तो संसार में काम का , क्रोध का , लोभ का एक्टिंग करना पड़ेगा । सबके साथ एक जैसा व्यवहार सही नहीं । 

 अपने गुरू के प्रति पुर्ण शरणागति का व्यवहार , अति दीनता का भाव प्रगट करो , प्रेम का भाव उत्पन्न करो आंसुओं के साथ । साधु जनों के साथ दीनता का व्यवहार, सम्मान का व्यवहार , विनम्रता का व्यवहार करो । अपने से उम्र में बड़े तथा विद्वान लोगों के साथ, सज्जनों के साथ नम्रता का व्यवहार , बच्चों या उम्र में छोटे के साथ स्नेह का व्यवहार , माता पिता आदि संबंधियों तथा शिक्षकों के साथ विनम्रता का, सहिष्णुता का व्यवहार, सम्मान का व्यवहार । गरीबों के प्रति , कमजोर के प्रति , लाचार के प्रति दया का व्यवहार , बीमारों के प्रति सहानुभूति तथा सेवा का व्यवहार । 

दुर्जनो के साथ,‌ दुष्ट लोगों के साथ कठोरता का व्यवहार । गलत लोगो के साथ उदासीनता का व्यवहार करना होगा । वर्ना सबके साथ एक जैसा व्यवहार करोगे संसार में तो लोग जीने नहीं देगा । संसार में बड़े बड़े ठग बैठे हैं । माथ मुड़ा के , टीका लगा के गेडूआ वस्त्र पहन साधु के भेष में डकैत भी घुमते है संसार में । संसार में आंख मुंद कर हर किसी पर विश्वास करना ठीक नहीं । गेडूआ वस्त्र पहनने वाला टीका चंदन लगाने वाला कंठी माला धारण करने वाला हर कोई साधु संन्यासी नहीं है , ठग भी घूमते है संसार में इन भेष भुषाओं में । इसलिए हर समय सावधान रहना आवश्यक है ।  
:- लोक व्यवहार कि कला से

Tuesday, 24 October 2023

असली वैराग्य क्या है ?

विषय भोग के कामना कि समाप्ति असली वैराग्य है ,संसारिक विषय भोग कि वस्तुओं का केवल शरीर से दुरी बना लेना वैराग्य या सन्यास नहीं है , विषय भोग से मन कि दुरी होना सन्यास है , वैराग्य है । विषय भोग कि तमाम वस्तुएं हो फिर भी उसमें जरा भी रूची न हो वो असली साधु है । 

जिसके पास विषय भोग रूपी धन नहीं हो और कोई इन वस्तुओं के अभाव में स्वयं को सन्यासी घोषित करे उसका कोई ठीक नहीं । वो सन्यासी नहीं । 

ईमानदार या चरित्रवान वो है जिसके पास बेईमानी का अवसर भरा परा हो , भ्रष्ट तथा चरित्रहिन होने का अवसर भरपुर मिल रहा हो उसे फिर भी उसका ईमान न डोले वो ईमानदार है । जिसको अवसर कभी मिला हीं नहीं बेईमानी का और वो स्वयं को ईमानदार कहता हो या समझता हो ऐसे जीव पर भरोसा कभी नहीं करना चाहिए । 
साधू , सन्यासी, चरित्रवान भले लोगों तथा भक्त की परीक्षा प्रतिकूल तथा अनुकूल दोनों परिस्थितियों में ही होता है । भगवान और गुरू उसे अनुकूल तथा प्रतिकूल दोनों परिस्थितियां देकर परीक्षा लेते है कि दोनों में जीव कैसा व्यवहार करता है ? कितना राग द्वेष ,मोह , लोभ , क्षोभ , हर्ष , विषाद , अहंकार, घृणा है किसी से संसार में ? यह कितना कम हुआ है ? इंद्र ने अर्जुन के पतन के लिए उसके पास स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी को भेज दिया नृत्य करके रिझाने के लिए पर वो उर्वशी का नृत्य देखने के बाद उसको मां कह कर पुकारा । 

क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो। :- दिनकर जी 

ऐसा गृहस्थ जिसके पास भरा पूरा संसार हो , संसार का सभी साधन हो फिर भी अपने गुरू से प्राप्त तत्वज्ञान द्वारा तथा साधना भक्ति सेवा के फलस्वरूप उसमें रूचि समाप्त होने लगे और गुरू तथा ईष्ट से प्रेम बढ़ने लगे , यदि किसी भी जीव के किसी भी व्यवहार से न सुख का, न दुख का , न मान सम्मान से, न अपमान से मन में किसी प्रकार का हर्ष या विषाद उत्पन्न हो तब समझना चाहिए कि हमारा वास्तव में उत्थान होने लगा है , हम सही रास्ते पर है । 

पुज्यनियां मां ने 2010 में अपने रांची के प्रवचन में उमर बगदाद का एक कथा सुनाई थी , पेश है पुनः- 

संसार मे रहो पर ध्यान रहे की संसार आप में न बसे | 
मशहूर सूफी संत उमर बगदाद में रहते थे। उनके पास रोज बड़ी संख्या में लोग मिलने आते थे। वे सभी से प्रेमपूर्वक व्यवहार करते और यथोचित सत्कार भी करते थे। एक बार एक दरवेश उनके पास पहुंचा। उसने देखा कि कहने को तो उमर फकीर हैं, लेकिन वे जिस आसन पर बैठे हैं, वह सोने का बना है। चारों ओर सुगंध है, जरी के पर्दे टंगे हैं, सेवक हैं तथा रेशमी रस्सियों की सजावट है। रस्सियों के निचले हिस्से में सोने के घुंघरू बंधे हैं जो जमीन तक आ रहे हैं। हवा चलती है तो रेशमी रस्सियां हिलती हैं, और उनके घुंघरू बज उठते हैं। कुल मिलाकर हर तरफ विलास और वैभव का साम्राज्य है। 

दरवेश देखकर भौंचक रह गया। उमर उसके सम्मान में कुछ कहते, इसके पहले ही दरवेश बोल उठा-'आपकी फकीराना ख्याति सुन दर्शन करने आया था, लेकिन देखता हूं आप तो भौतिक संपदा के बीच मजे में हैं।' उमर ने कहा-'तुम्हें ऐतराज है तो मैं इसी पल यह सब वैभव छोड़कर तुम्हारे साथ चलता हूं।' दरवेश ने हामी भरी और कुछ ही पलों में उमर सब छोड़कर उसके साथ चल पड़े। दोनों पैदल कुछ दूर चले होंगे कि अचानक दरवेश पीछे मुड़ा। उमर ने वजह पूछी तो उसने बताया कि वह उमर के ठिकाने पर अपना कांसे का एक कटोरा भूल आया है। उसे लेना जरूरी है, इसलिए फिर वहीं लौटना होगा।'

तब उमर ने हंसते हुए कहा-'बस यही बात है। मैं तुम्हारी एक आवाज पर अपना लाखों का भौतिक साम्राज्य पल भर में ठोकर मारकर आ गया, लेकिन तुम एक कटोरे का मोह भी न निकाल पाए। मेरे ठिकाने की रेशमी रस्सियां तो धरती की मांटी तक धंसी थीं। यह कटोरे का मोह तुम्हारे मन में धंसा है। जब तक मन में किसी भी चीज को मोह है तब तक भगवान को पाना कठिन है।' दरवेश लज्जित हो गया।