Wednesday, 24 March 2021

सतयुग , त्रेता , द्वापर , कलयुग में क्या क्या परिवर्तन हुआ ? पढीए

सतयुग - सतयुग में लोग सतोगुणी थे, सच्चाई पर, सत्य के राह पर चलने वाले लोग थे, देवता थे, तपस्वी थे, ऋषी मुनी थे, राक्षस नहीं था। हर तरफ शांती था, लोग दैवी गुणो से युक्त थे, देव दर्शन, भगवान का दर्शन सुलभ था। मनुष्य की ऊँचाई 21 हाथ, यानी 28 fit का था, लोगों की आयु लाखों बर्ष की थी। मानव शरीर से सुगन्ध निकलता था। चारो तरफ प्रकृति में सुगन्ध युक्त फुल खिलते थे। चारो तरफ सुगन्ध युक्त हवाएं बहती थी। धर्म, अर्थ, काम, ज्ञान, वैराग्य, सुलभ था। लोग परमार्थी थे। घरो में जंजीरे नहीं लगती थी। गाय दुध बहुत देती थी।

त्रेता - फिर त्रेता आया लोग सतोगुणी और रजोगुणी हूए, मनुष्य की ऊँचाई छिन हूई, लोग 14 हाथ, यानी 18 fit के आस पास थे, कुछ लोगों के चरित्र का थोड़ा सा पतन हुआ, केवल सतोगुणी लोगों के शरीर से सुगन्ध निकलता था। लोगों का उम्र लाखों बर्ष से घट कर हजोरो बर्ष की हो गई, ज्यादा तर लोग साधुवृति के थे, योगी थे, जपी- तपी थे, तपस्वी थे, तप के वल पर दैवी शक्ति हासील करना आसान था, देवता देव लोक मे रहने लगे, इसी युग में अलग राज्य में बड़े बड़े राक्षसों का जन्म हुआ जैसे हिरणकश्प, हिरण्याक्ष आदि, श्री लंका जैसे अलग प्रदेश में राक्षस कुल का प्रादुर्भाव हुआ, रावन, कुम्भकरन, मेघनाथ, जैसा प्राक्रमी राक्षसों का जन्म हुआ। राक्षस जप और तप के वल पर भगवान से शक्ति, आशिर्वाद व वरदान प्राप्त कर मानवता का दुश्मन हो गय, देव, गंधर्व, किन्नर, बडे बड़े ऋषी मुनियों को सताने लगे। फिर भगवान को राम रुप में आना परा और राक्षसों का बिनाश करके फिर से राम राज्य की स्थापना करनी परी, यानी मानवता की स्थापना करनी परी। घरों में जंजीरे नहीं थी, चोरियां नहीं थी। गाय की दुध थोड़ी कम हो गई। रोग शोक नहीं था।

द्वापर - फिर आया द्वापर, द्वापर में लोगों की ऊँचाई 11 हाथ यानी 14 से 15 fit का रह गया, मानव उम्र 100 से 150 वर्ष के आस पास रह गया, लोगों का नैतिक पतन होने लगा, चरित्र गिरने लगा, लोग रजोगुणी तथा तमोगुणी होने लगें, स्वार्थी होने लगे सतोगुणी की संख्या तेजी से घटने लगी, लोग रोग, शोक, कफ, पीत आदि और आपसी संघर्ष का शिकार होने लगे। किड़े मकोड़े जन्म लेने लगे पर संख्या कम थी। शरीर से सुगन्ध निकलना बन्द हो गया। अब इस युग में राक्षस कहीं अलग प्रदेश में न पैदा होकर मानव समुदाय समाज के बीच जन्म लेने लगें, राज करने लगें, क्योंकि मानवता समाप्त होने लगी, सतोगुणी की संख्या घटने लगी, राक्षसी प्रवृती और राक्षसों का साम्राज्य बढ़ने लगा। जैसे कंस, जरासंघ, पुतना, अघासुर, वकासुर आदि, इसके साथ साथ ही मानवता समाप्त होने लगी, राजा, शिक्षक, स्वार्थी होने लगें, धर्म और कर्म घटने लगा। घरों में जंजीरे लगने लगी। अनाचार बढने लगा, फिर इसी काल में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण आय और अधर्म और अधर्मी का विनाश करके धर्म को पुणर्स्थापित किए।
कलयुग - ( चार साल पहले के पोस्ट से)(आजकल कलयुग में नय नय वायरसों ने जन्म लेना शुरू कर दिया ) 
फिर आया कलयुग, जैसा की हम आप देख रहें है, लोगों की ऊँचाई मात्र साड़े तीन हाथ यानी 5 फीट रह गया। औसत उम्र आजकल 60 से 70 बर्ष। 90 ℅ लोग तमोगुणी है। शरीर से दुर्गन्ध ही निकलता है। 

फुलों की खुशबु भी कमतर हो गई। अन्न का उत्पादन एक कट्टे में एक चौथाई रह गया। 
गाय का दुध कम तर तथा कम पौस्टिक हो गई, किड़े मकोड़े की संख्या तीव्र गति से बढ़ती जा रही हैं, ।

नय नय बिमारियां महामारी लोगों को, जीवो को काल के गाल में भेज रही हैं। चारो तरफ झुठ है। घरो में ताले का भी वैल्यू नहीं हैं। अशांती हैं। 

नैतिकता, सच्चाई, ईमानदारी, मानवता, नेकी, पुण्य, धर्म, कर्म, चरित्र केवल किताबों में मिलते हैं। आज राक्षस बाहर कही नहीं हैं। आज राक्षसों को भी शर्म महसुस होती है अलग राज्य में जन्म लेने में। इसलिय ये सभी राक्षस हमारे आपके मन को, ह्रदय को, चेतना को ही अपना घर बना चुके हैं, उनके लिय आसान हो गया हमारे मन, मस्तिष्क पर कब्जा करने में, आज आप जानते है वे राक्षस कौन कौन हैं ?

 हाँ तो जानते हैं आप सब, वे हैं, काम, क्रोध, मद्, मोह, लोभ, घृणा, द्वेश, ईर्श्या, अहंकार, कुबूद्धि, दुर्बुधि आदि, जो हमारे अंदर ही बैठ कर, डेरा जमाकर हमारा लगातार पतन कर रहें हैं। 
चुँकि आज कलयुग में चारो तरफ अधर्म का बोलबाला हैं, झुठ का साम्राज्य हैं, चोरों का राज्य हैं। चोर जोर जोर से चिल्ला कर सच्चाई को दवा रहा हैं, धर्म के आर में ढोंगीयों का बाढ़ आ गया हैं इसलिय कलयुग में न धर्म है, न कर्म, न कर्मकांड, न जप, न तप और न वैराग्य। केवल भक्ति ही शेष और सक्षम है प्रभु को प्राप्त कर इस मृत्यु लोक को छोड़ कर उनके धाम को प्राप्त कर हमेशा के लिय राक्षसों से मुक्त होकर प्रभु चरणों में निवास करने के लिय। 

अब भगवान आते है केवल सद्गुरु रुप में, जैसे हमारे महाराज जी आय और अपने प्यारो को समझा बुझा कर, मार्ग दर्शन करके चले गये, अपने लोक में आने का मार्ग बता दिया। 

अब यह हमारे उपर है। भगवान ने दो कृपा कर दी - पहले हमें मानव तन दे दिया भक्ति के लिय, दुसरा खुद गुुरु रुप में आकर हमारा मार्ग दर्शन किया, शास्त्रो के, वेदों के सही अर्थो को समझाया। अब तीसरी कृपा हमें खुद को करना है अपने उपर, उनके बताए हुए मार्ग पर चलकर अपने ह्रदय को निर्मल बनाना होगा। 

यानि गुरु को, भगवान को अपने ह्रदय में धारण करके अपने मन के अन्दर ह्रदय के अन्दर बैठे काम, क्रोध आदि राक्षसों को भगाना होगा, गुरु का शरण ग्रहण करने मात्र से हमारे पापों का राक्षसों का, राक्षषी प्रवृती का समन होगा, फिर ह्रदय शुद्ध होगा, निर्मल होगा, तब जाकर हमारे गुरु अपनी अंतिम कृपा करेंगें, वो है प्रेम दान, हमारे महाराज जी प्रेम दान देकर सदा के लिय भगवान का लोक देकर, उनकी सेवा दे कर मालोमाल कर देंगें। अब अपना कल्याण खुद को करना हैं नहीं तो फिर मानव तन कब मिलेगा पता नहीं। यह मानव तन छिन लिया जाएगा, रोग, शोक, और असामायिक मृत्यु के द्वारा। जैसे जैसे कलयुग बीतेगा। पृथ्वी पर मानव मानव को मार कर खाऐगें। सूर्य का ताप, ठंडी गरमी, बाढ़, माहामारी तथा भयावह रोगों की संख्या बढती जाएगी। इसलिय समय रहते हमे अपना कल्याण करना होगा। राधे राधे श्री राधे । 
पुराणों से निर्गत :- संजीव कुमार 


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